भारत का फर्टिलिटी रेट (TFR) अब रिप्लेसमेंट लेवल **2.1** से गिरकर **2.0** पर आ गया है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के संजीव सान्याल का कहना है कि अब जनसंख्या नियंत्रण की पुरानी सरकारी योजनाओं पर पैसा खर्च करना समय की बर्बादी है।
बदलती डेमोग्राफी और नया चैलेंज
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के ताजा आंकड़ों ने भारत की डेमोग्राफिक तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। देश का टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) अब 2.0 पर पहुंच गया है, जो कि 2.1 के उस रिप्लेसमेंट लेवल से कम है, जिसे आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी माना जाता है।
संजीव सान्याल की चेतावनी
आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हमारी सरकारी मशीनरी अभी भी पुरानी मानसिकता में जी रही है। सरकार आज भी जनसंख्या नियंत्रण प्रोग्राम्स पर हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रही है, जिनकी अब खास जरूरत नहीं है। उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में आज भी बड़ी संख्या में महिलाओं का स्टरलाइजेशन (नसबंदी) किया जा रहा है, जो सरकारी संसाधनों का सही इस्तेमाल नहीं है।
आर्थिक नीति में बदलाव की जरूरत
चीन, जापान और साउथ कोरिया का उदाहरण देते हुए सान्याल ने संकेत दिया कि हमें अतीत की गलतियों से सीखना होगा। जैसे-जैसे वर्किंग-एज पापुलेशन कम होगी, वैसे-वैसे देश की चुनौती 'आबादी को कंट्रोल करना' नहीं, बल्कि 'ह्यूमन कैपिटल' को बेहतर बनाना होगी।
अब बाजार और जानकारों की नजर आगामी यूनियन बजट पर है। क्या सरकार जनसंख्या नियंत्रण का पैसा हटाकर शिक्षा, हेल्थकेयर और स्किल डेवलपमेंट की तरफ मोड़ेगी? यह देखना काफी दिलचस्प होगा, क्योंकि भविष्य की इकॉनमी अब उत्पादकता (Productivity) पर टिकी होगी, न कि सिर्फ लोगों की संख्या पर।
