भारत के FTA पार्टनर देशों के साथ एक्सपोर्ट में अप्रैल-जुलाई **2026** के दौरान **23.9%** की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे इन देशों के साथ व्यापार घाटा कम हुआ है। हालांकि, कुल मिलाकर देश का ट्रेड डेफिसिट **$118.6 बिलियन** तक पहुंच गया है, क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक और तकनीकी उपकरणों के आयात का बिल लगातार बढ़ रहा है।
दोहरी तस्वीर: एक्सपोर्ट में तेजी बनाम बढ़ता आयात बिल
फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के पहले चार महीनों का ट्रेड डेटा एक मिली-जुली कहानी बयां करता है। जहां एक तरफ FTA (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) वाले देशों को होने वाले एक्सपोर्ट में 23.9% की जोरदार वृद्धि के साथ आंकड़ा $57.2 बिलियन पहुंच गया है, वहीं दूसरी तरफ देश का कुल मर्चेंडाइज ट्रेड डेफिसिट $118.6 बिलियन के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है।
क्यों कम हुआ FTA घाटा?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, FTA देशों के साथ व्यापार घाटा $34.2 बिलियन से घटकर $32.6 बिलियन रह गया है। इसकी बड़ी वजह भारतीय कंपनियों का ट्रेड रेगुलेशंस और रूल्स-ऑफ-ओरिजिन डॉक्युमेंटेशन को समझने में आई दक्षता है। फार्मास्युटिकल्स, इंजीनियरिंग गुड्स और टेक्सटाइल की तंजानिया, दक्षिण अफ्रीका और केन्या जैसे उभरते बाजारों में मांग ने इस ग्रोथ को रफ्तार दी है। साथ ही, ओमान के साथ हाल ही में लागू हुए CEPA एग्रीमेंट और सिंगापुर से मिल रहे ऑर्डर ने भी एक्सपोर्ट के आंकड़ों को मजबूत किया है।
आयात का दबाव और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग
कुल ट्रेड डेफिसिट के बढ़ने के पीछे की बड़ी वजह 19.27% की रफ्तार से बढ़ता आयात है, जो अब $292.38 बिलियन पर है। वहीं, एक्सपोर्ट में 17.04% की बढ़त के साथ आंकड़ा $173.78 बिलियन रहा। गौर करने वाली बात यह है कि इलेक्ट्रॉनिक्स और कंप्यूटर हार्डवेयर जैसे कंपोनेंट्स का आयात बढ़ रहा है। यह दर्शाता है कि भारत घरेलू स्तर पर असेंबली और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रहा है, जिसके लिए तकनीकी इनपुट्स मंगाने पड़ रहे हैं।
निवेशकों के लिए जरूरी संकेत
इन्वेस्टर्स को अब यह देखना होगा कि क्या यह एक्सपोर्ट-लेड ग्रोथ टिकाऊ है। लगातार बढ़ता ट्रेड डेफिसिट भारतीय रुपये (INR) पर दबाव डाल सकता है और अगर इम्पोर्ट कॉस्ट अधिक बनी रही, तो इसका असर महंगाई पर भी पड़ सकता है। आने वाली तिमाहियों में यह देखना अहम होगा कि क्या कंपनियां ग्लोबल जियोपॉलिटिकल अस्थिरता के बीच अपने प्रॉफिट मार्जिन को सुरक्षित रख पाती हैं या नहीं।
