FCNR डिपॉजिट्स ने फिलहाल रुपये को सहारा दिया है और सिस्टम लिक्विडिटी को **3%** तक पहुँचाया है। लेकिन एक्सपर्ट्स इसे अस्थायी राहत मान रहे हैं, क्योंकि लंबी अवधि की स्टेबिलिटी के लिए विदेशी निवेश (FII) का आना बेहद जरूरी है।
भारतीय अर्थव्यवस्था को इस समय Foreign Currency Non-Resident (FCNR) डिपॉजिट्स से एक बड़ी राहत मिली है, जिसने बैलेंस ऑफ पेमेंट्स को सहारा दिया है। अक्टूबर 2026 की शुरुआत तक ये इनफ्लो $127 अरब से $137 अरब के बीच आंका गया है। इसने रुपये को उस वक्त मजबूती दी है जब वह ₹96.31 के स्तर के आसपास दबाव झेल रहा था। सितंबर में लिक्विडिटी बढ़कर नेट डिमांड और टाइम लायबिलिटीज का 3% हो गई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसे स्थायी सुधार समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।
रिपेमेंट का रिस्क और भविष्य की चुनौती
इस लिक्विडिटी में Reserve Bank of India की स्पेशल FCNR(B) स्वैप विंडो की अहम भूमिका रही है। हालांकि यह विंडो 31 अगस्त 2026 को बंद हो चुकी है, लेकिन इसका असर अभी भी दिख रहा है। दिक्कत यह है कि ये पैसा लॉन्ग-टर्म कैपिटल नहीं है, बल्कि उधार लिया हुआ पैसा है जिसे एक निश्चित समय पर वापस करना होगा। इससे भविष्य में एक 'क्लिफ इफेक्ट' का खतरा पैदा हो गया है, जब इन डिपॉजिट्स की मैच्योरिटी पर पूंजी बाहर जाएगी।
ट्रेड डेफिसिट और स्ट्रक्चरल कमजोरी
देश का गुड्स ट्रेड डेफिसिट जीडीपी के 9% तक पहुंच गया है, जो एक दशक में सबसे ज्यादा है। हालांकि अगस्त 2026 में ट्रेड डेफिसिट घटकर $26.86 अरब रहा, लेकिन कुल अंतर अभी भी बहुत बड़ा है। इसी बीच, Foreign Institutional Investors (FIIs) लगातार बिकवाली कर रहे हैं। इसकी मुख्य वजह अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का 5.3% के पार जाना है, जिससे इमर्जिंग मार्केट्स से पैसा निकल रहा है।
बैंकिंग सेक्टर पर दबाव
पिछले दो महीनों में क्रेडिट ग्रोथ 19% के मजबूत स्तर पर रही है, लेकिन अब इस पर भी दबाव दिखने की संभावना है। अक्टूबर से शुरू हो रहे एडवर्स बेस इफेक्ट्स के कारण बैंकों के लिए इस रफ्तार को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा। अब निवेशकों की नजरें ट्रेड डेफिसिट के आंकड़ों और FII फ्लो पर टिकी हैं, जो बताएंगे कि भारतीय अर्थव्यवस्था लंबी अवधि की स्थिरता के लिए तैयार है या नहीं।
