साल 2026 में विदेशी निवेशकों (FPIs) की तरफ से ₹3 लाख करोड़ से ज्यादा की निकासी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। अब स्टेबिलिटी बनाए रखने के लिए सरकार का पूरा जोर एक्सपोर्ट को बढ़ाने और व्यापारिक बाधाओं को दूर करने पर है।
साल 2026 भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक चुनौतीपूर्ण मोड़ लेकर आया है। वर्षों तक भारतीय बाजारों ने विदेशी निवेश के दम पर अपनी स्थिति मजबूत रखी, लेकिन इस साल स्थिति बदली हुई है। अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय इक्विटी से ₹3 लाख करोड़ से ज्यादा की पूंजी निकाल ली है, जिसमें अकेले अक्टूबर महीने की निकासी ₹44,166 करोड़ रही है।\n\n### RBI की चिंता और एक्सपोर्ट की जरूरत\nरिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने साफ संकेत दिए हैं कि विदेशी फंड्स की यह अस्थिरता रुपये और पूरी इकॉनमी के लिए एक जोखिम है। जब विदेशी पैसा बाहर जाता है, तो देश को अपनी विदेशी मुद्रा जरूरतों को पूरा करने के लिए निवेश के बजाय ट्रेड (व्यापार) पर निर्भर होना पड़ता है। यही वजह है कि अब एक्सपोर्ट सेक्टर का प्रदर्शन भारत के लिए 'लाइफलाइन' बन गया है।\n\n### एक्सपोर्ट में सुस्ती और सरकारी अड़चनें\nचिंता की बात यह है कि कुल इकोनॉमिक आउटपुट में एक्सपोर्ट का हिस्सा 2011-12 के करीब 17% से गिरकर 2025-26 में लगभग 11.4% पर आ गया है। वैश्विक तनाव और टैरिफ के अलावा, घरेलू स्तर पर नौकरशाही की जटिलताएं भी बड़ी बाधा हैं। कई बार कड़े अनुपालन नियम (compliance norms) भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करने से रोकते हैं।\n\n### आगे की राह: क्या होगा बदलाव?\nभारत को अब वित्त, वाणिज्य और विदेश मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है ताकि व्यापारिक नीतियों का लाभ प्राइवेट सेक्टर को मिल सके। इसके अलावा, यूरोपियन यूनियन और यूके जैसे बाजारों में सस्टेनेबिलिटी और कार्बन ऑडिट के बढ़ते नियमों को देखते हुए भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को अपनी इंफ्रास्ट्रक्चर और लेबर पॉलिसी को आधुनिक बनाना होगा।\n\nनिवेशकों को अब अमेरिका के साथ प्रस्तावित ट्रेड डील और कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल की बातचीत पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। सरकार की ओर से कस्टम ड्यूटी को आसान बनाने और व्यापारिक बाधाओं को हटाने के फैसले ही तय करेंगे कि भारत आने वाले समय में आर्थिक स्थिरता कैसे बनाए रखता है।
