भारत का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जहां दुनिया में मिसाल बन रहा है, वहीं पर्यावरण निगरानी के क्षेत्र में डेटा की कमी बड़ी समस्या खड़ी कर रही है। पुराने मैन्युअल सिस्टम के कारण अब लॉन्ग-टर्म इकोनॉमिक प्लानिंग और रेगुलेटरी क्लीयरेंस में अनिश्चितता का खतरा बढ़ गया है।
भारत ने अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, जैसे कि Unified Payments Interface (UPI) के जरिए ग्लोबल स्तर पर लोहा मनवाया है। लेकिन, इसके ठीक उलट पर्यावरण गवर्नेंस (Environmental Governance) की स्थिति काफी चिंताजनक है। रियल-टाइम और पारदर्शी डेटा की कमी के कारण महत्वपूर्ण संसाधनों का प्रबंधन करना मुश्किल हो गया है। आज भी ग्राउंडवॉटर, फॉरेस्ट और वेटलैंड कंजर्वेशन जैसे सेक्टर पुराने और मैन्युअल डेटा प्रोसेस पर ही निर्भर हैं।
इकोनॉमिक और रेगुलेटरी रिस्क
यह डेटा गैप सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नेशनल इकोनॉमिक सिक्योरिटी के लिए भी बड़ा खतरा है। 'State of India’s Environment 2026' रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का इकोलॉजिकल प्रेशर बढ़ रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि 2026 Environmental Performance Index में भारत 176वें नंबर पर है, जो डेटा-ड्रिवन गवर्नेंस में आ रही दिक्कतों को दर्शाता है।
इन्वेस्टर्स के लिए रिस्क तब बढ़ जाता है जब बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का पर्यावरण क्लीयरेंस पुरानी सैटेलाइट इमेज या पुराने फील्ड रिपोर्ट्स के आधार पर मिलता है। ऐसे में अचानक आने वाले रेगुलेटरी बदलाव या लीगल स्क्रूटनी प्रोजेक्ट्स की टाइमलाइन को प्रभावित कर सकते हैं।
भविष्य की चुनौतियां
Central Ground Water Board जैसी संस्थाओं के पास कुओं का बड़ा नेटवर्क तो है, लेकिन डिजिटाइजेशन और रियल-टाइम मॉनिटरिंग की रफ्तार अभी भी सुस्त है। साथ ही, अलग-अलग राज्यों में सरकारी फाइलों और ग्राउंड हकीकत के बीच के फर्क ने भी इंडस्ट्री की राह में मुश्किलें खड़ी कर दी हैं।
जैसे-जैसे ग्लोबल ट्रेड और फाइनेंस में ESG (Environmental, Social, and Governance) स्टैंडर्ड्स अनिवार्य होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे रियल-टाइम डेटा प्रदान करने की क्षमता एक कॉम्पिटिटिव जरूरत बन गई है। अब नजरें इस पर टिकी हैं कि सरकार कब तक डिजिटल टेलीमेट्री और ऑटोमेटेड ऑडिटिंग को गवर्नेंस फ्रेमवर्क में पूरी तरह शामिल करती है, ताकि मैन्युअल रिपोर्टिंग की जगह डेटा-लेड मॉनिटरिंग ले सके।
