भारत की इकोनॉमी में बड़ा बदलाव: मेट्रो को टक्कर देंगे नए आर्थिक हब!

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorKaran Malhotra|Published at:
भारत की इकोनॉमी में बड़ा बदलाव: मेट्रो को टक्कर देंगे नए आर्थिक हब!
Overview

Dun & Bradstreet की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था अब सिर्फ बड़े मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं रह गई है। देश के उत्तरी और पूर्वी राज्यों के उभरते हुए जिले तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं, जो बड़े शहरों के दबदबे को चुनौती दे रहे हैं।

भारत का बदलता आर्थिक नक्शा

Dun & Bradstreet के सिटी वाइटेलिटी इंडेक्स (CVI) की Q1 2026 की ताज़ा रिपोर्ट ने भारत के आर्थिक परिदृश्य में एक बड़े बदलाव का संकेत दिया है। हालांकि बड़े मेट्रो शहर अभी भी देश की आर्थिक ताकत का केंद्र हैं, लेकिन अब उत्तरी और पूर्वी भारत के कई जिले भी तेजी से उभर रहे हैं। यह ट्रेंड बड़े शहरों में केंद्रित विकास की पुरानी धारणा को चुनौती देता है और निवेश की रणनीतियों में नए सिरे से सोचने पर मजबूर करता है।

नए ग्रोथ सेंटर्स का उदय

CVI रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर और पूर्वी भारत के कई जिलों की रैंकिंग में जबरदस्त उछाल आया है। गुरुग्राम, हुगली, मुरादाबाद, समस्तीपुर और मधुबनी जैसे शहरों ने अपनी स्थिति सुधारी है। गोंडा का 20-स्थान का प्रभावशाली उछाल दिखाता है कि कैसे इंफ्रास्ट्रक्चर, कृषि और कनेक्टिविटी में सुधार स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को नया रूप दे रहे हैं। यह नए ग्रोथ सेंटर्स के उभरने का स्पष्ट संकेत है। अहमदाबाद अभी भी समग्र रैंकिंग में सबसे ऊपर है, जबकि दिल्ली तीसरे स्थान पर पहुंच गया है।

उभरते बाजारों की ताकत

यह विकेंद्रीकरण (decentralization) टियर-2 और टियर-3 शहरों द्वारा पेश किए जा रहे बड़े आर्थिक फायदों पर आधारित है। इन उभरते केंद्रों में रियल एस्टेट, टैलेंट हायरिंग और ऑपरेशनल खर्चों में बड़े शहरों की तुलना में 25-50% तक की बचत हो सकती है। खास तौर पर, गैर-मेट्रो क्षेत्रों में रियल एस्टेट और टैलेंट की लागत 30-50% सस्ती हो सकती है, जिससे कंपनियों, खासकर शुरुआती चरण की कंपनियों के लिए पूंजी की दक्षता (capital efficiency) बढ़ती है। इसके अलावा, सरकार की 'पीएम गति शक्ति' (PM Gati Shakti), AMRUT और स्मार्ट सिटी मिशन जैसी पहलों से इन विकासशील शहरी क्षेत्रों में भारी निवेश हो रहा है। सड़कों, पानी और बिजली जैसे महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार हो रहा है। बजट 2026-27 में सिटी इकोनॉमिक रीजन्स (CERs) के विकास पर जोर देना भी इस क्षेत्रीय विकास की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

ऐतिहासिक और मैक्रो आर्थिक जड़ें

यह आर्थिक विकेंद्रीकरण कोई नई बात नहीं है। भारत में हमेशा से क्षेत्रीय विकास की नीतियां रही हैं। मौजूदा ढांचागत बदलाव व्यापक मैक्रो आर्थिक रुझानों के अनुरूप हैं, जिसमें अगले दो दशकों में सालाना 7.8% की मजबूत GDP ग्रोथ का अनुमान है। एनालिस्ट्स का मानना है कि भारत 2027 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। CVI की 99% तक की नॉमिनल GDP के साथ मजबूत सहसंबंध (correlation) इस बदलते आर्थिक परिदृश्य को ट्रैक करने में इसकी उपयोगिता को मान्य करता है।

चुनौतियां और जोखिम

जहां यह विकेंद्रीकरण का रुझान अवसर पैदा कर रहा है, वहीं कुछ जोखिम भी हैं, खासकर स्थापित मेट्रो शहरों के लिए। आर्थिक गतिविधियों और प्रतिभा का छोटे शहरों की ओर पलायन धीरे-धीरे बड़े शहरों के प्रीमियम वैल्यूएशन और बाजार के दबदबे को कम कर सकता है। टियर-2 और टियर-3 शहरों में रियल एस्टेट की बढ़ती मांग और तेजी से फैलते इंफ्रास्ट्रक्चर में पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसके अलावा, नई प्रशासनिक इकाइयों का गठन और शासन की जटिलता नौकरशाही की अक्षमता पैदा कर सकती है, जो आर्थिक नियंत्रण और नीतिगत प्रतिक्रियाओं को प्रभावित कर सकती है। कुल GDP और निर्यात का एक छोटे से हिस्से में केंद्रित होना इस बात का संकेत देता है कि अभी भी महत्वपूर्ण असमानताएं मौजूद हैं।

Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.