भारत की अर्थव्यवस्था के सामने कुछ गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। फाइनेंशियल ईयर 2025 में क्रूड ऑयल पर निर्भरता बढ़कर **88.2%** हो गई है, वहीं मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का GVA में योगदान घटकर **15.2%** पर आ गया है।
भारत की इकोनॉमी ग्लोबल स्तर पर तो चमक रही है, लेकिन फाइनेंशियल ईयर 2024-25 के डेटा कुछ गंभीर स्ट्रक्चरल बदलावों की तरफ इशारा कर रहे हैं। हालांकि घरेलू डिमांड मजबूत बनी हुई है, लेकिन बढ़ती ऊर्जा लागत और इंडस्ट्रियल सेक्टर की सुस्ती लंबी अवधि के लिए चिंता का विषय है।
क्रूड ऑयल का बढ़ता बोझ
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, देश की क्रूड ऑयल आयात पर निर्भरता 88.2% के स्तर पर पहुंच गई है, जो कि एक दशक पहले 77.6% थी। यह आयात निर्भरता देश को ग्लोबल प्राइस वोलैटिलिटी (Price Volatility) के प्रति संवेदनशील बनाती है, जिससे महंगाई और ट्रेड डेफिसिट पर सीधा असर पड़ता है। इसके अलावा, फर्टिलाइजर सेक्टर भी आयातित कच्चे माल पर 70% तक निर्भर है।
मैन्युफैक्चरिंग और AI का दबाव
सरकारी PLI स्कीमों के बावजूद मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अपनी जगह बनाने में संघर्ष कर रहा है। Infomerics Ratings के अनुसार, GVA में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान 2021-22 के 18.5% से गिरकर अब 15.2% रह गया है। लॉजिस्टिक्स की ऊंची लागत और सप्लाई चेन की दिक्कतें इसमें बड़ी रुकावट हैं। वहीं, सर्विसेज सेक्टर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बढ़ता दखल व्हाइट-कॉलर जॉब्स के पारंपरिक मॉडल के लिए एक नया रिस्क पैदा कर रहा है।
निवेशकों के लिए जरूरी संकेत
आने वाले क्वार्टर्स में निवेशकों को ऊर्जा के ट्रेड बैलेंस और PLI-बैक्ड प्रोजेक्ट्स की परफॉर्मेंस पर बारीक नजर रखनी चाहिए। इसके साथ ही, यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि सर्विस कंपनियां खुद को AI दौर में कैसे ढालती हैं और मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां इनपुट लागत को कैसे कंट्रोल करती हैं।
