भारत की जीडीपी का **50%** हिस्सा केवल पाँच राज्यों से आ रहा है। निवेश और क्रेडिट का बड़ा झुकाव चुनिंदा शहरी केंद्रों की तरफ होने से सप्लाई चेन और इंफ्रास्ट्रक्चर पर गहरा दबाव बन रहा है।
भारत के आर्थिक विकास का पहिया कुछ ही राज्यों के इर्द-गिर्द घूम रहा है, जो लॉन्ग-टर्म निवेश रणनीति बनाने वाले निवेशकों के लिए चिंता का विषय हो सकता है। मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि देश की कुल जीडीपी में 50% योगदान सिर्फ पाँच राज्यों का है। यह असमानता केवल आउटपुट तक सीमित नहीं है, बल्कि क्रेडिट एक्सेस और बड़े प्रोजेक्ट्स में भी साफ दिखती है। महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्य फाइनेंशियल लिक्विडिटी और इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स का बड़ा हिस्सा हड़पे हुए हैं, जिससे बाकी क्षेत्र पिछड़ते जा रहे हैं।
निवेशकों के लिए क्यों है यह जरूरी?
कंपनियां अपने मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस हब ऐसे औद्योगिक गलियारों (industrial corridors) में बनाना पसंद करती हैं जहाँ इंफ्रास्ट्रक्चर और टैलेंट की उपलब्धता बेहतर हो। हालांकि, यह रुझान पूंजी को चुनिंदा क्षेत्रों में ही रोक रहा है। इससे एक तरफ ऑपरेशनल फायदा तो मिलता है, लेकिन दूसरी तरफ क्षेत्रीय निर्भरता बढ़ जाती है, जो आर्थिक संकट के समय भारी पड़ सकती है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और लागत पर दबाव
बेंगलुरु, मुंबई और ठाणे जैसे शहरों पर बढ़ता दबाव बुनियादी ढांचे की कमर तोड़ रहा है। जब विकास एक छोटे दायरे में सिमटा होता है, तो कंपनियों को जमीन की बढ़ती कीमतों, लॉजिस्टिक्स की बाधाओं और लेबर माइग्रेशन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यदि इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार की गति धीमी रहती है, तो आने वाले समय में कंपनियों की परिचालन लागत (operational cost) में भारी उछाल आना तय है।
बाजार के जानकारों का मानना है कि अब सस्टेनेबिलिटी बनाए रखने के लिए यह देखना जरूरी है कि क्या कंपनियां लागत घटाने के लिए सेकेंडरी शहरों (tier-2 cities) की ओर रुख करती हैं, या फिर मौजूदा हब ही अपनी चमक बरकरार रखते हैं।
