भारत ने पेट्रोल में **20%** इथेनॉल ब्लेंडिंग के लक्ष्य को **2030** की डेडलाइन से काफी पहले ही पूरा कर लिया है। हालांकि यह एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इससे खाने-पीने की चीजों की कीमतों और सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
डिमांड और सप्लाई में बड़ा अंतर
इथेनॉल प्रोग्राम की रफ्तार का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को इथेनॉल की सप्लाई 2019-20 से 2025-26 के बीच 38% सालाना की दर से बढ़ी है। इसके मुकाबले, पारंपरिक कच्चे माल (Feedstock) की पैदावार काफी पीछे है। इस दौरान गन्ने का उत्पादन सिर्फ 5.1% और चावल का उत्पादन 4.4% बढ़ा है। यह गैप फूड और फ्यूल के बीच एक बड़ा संकट पैदा कर रहा है।
महंगाई और सरकारी सफाई
चीनी की बढ़ती कीमतों के चलते यह विवाद गहरा गया है कि क्या इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल ही महंगाई की असली वजह है। सरकार ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि कीमतों में उछाल मौसमी मांग, रेड रॉट (Red Rot) जैसी बीमारियों और फसलों को हुए नुकसान के कारण है, न कि इथेनॉल पॉलिसी की वजह से।
मक्का (Maize) पर दांव
खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने अब मक्के पर फोकस बढ़ा दिया है। आंकड़ों के अनुसार, मक्के की खेती का रकबा 2022-23 के 1.07 करोड़ हेक्टेयर से बढ़कर 2025-26 तक 1.44 करोड़ हेक्टेयर तक पहुंच गया है। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि क्या मक्के की पैदावार इथेनॉल की मांग को बिना महंगाई बढ़ाए पूरा कर पाएगी या नहीं।
