भारतीय निवेशकों के लिए एक बड़ा मुद्दा सामने आया है, जहां डेट निवेश पर लगने वाला टैक्स इक्विटी के मुकाबले काफी ज्यादा है। बाजार के जानकारों का मानना है कि यह अंतर कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट के विकास में बाधा बन रहा है और सरकार को इस पर पॉलिसी रिफॉर्म करने की जरूरत है।
भारत की टैक्स प्रणाली में इक्विटी और डेट निवेश के बीच एक गहरी खाई दिख रही है। मौजूदा नियमों के तहत, इक्विटी पर 12.5% का लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स लगता है (जो ₹1.25 लाख से अधिक मुनाफे पर लागू है), जबकि डेट म्यूचुअल फंड्स और फिक्स्ड-इनकम इंस्ट्रूमेंट्स पर निवेशकों को उनके टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स चुकाना पड़ता है। सबसे बड़ी बात यह है कि यहां अब इंडेक्सेशन का कोई बेनिफिट भी नहीं मिलता है।
टैक्स का गणित और निवेशकों का संकट
जो निवेशक ऊंचे टैक्स ब्रैकेट में आते हैं, उन्हें डेट निवेश से होने वाली कमाई पर 30% से ज्यादा टैक्स देना पड़ सकता है। जानकारों का कहना है कि इसी असंतुलन की वजह से निवेशक बिना जोखिम उठाए भी इक्विटी की ओर भाग रहे हैं। यह स्थिति लॉन्ग-टर्म घरेलू बचत के लिए फिक्स्ड-इनकम टूल्स को कम आकर्षक बना रही है।
कॉर्पोरेट जगत के लिए चुनौती
औद्योगिक विकास के लिए डेट फाइनेंसिंग एक मुख्य आधार है। फाइनेंशियल ईयर 2026 तक आउटस्टैंडिंग कॉर्पोरेट बॉन्ड्स का आंकड़ा ₹59 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। अगर टैक्स के अंतर के कारण बॉन्ड्स की मांग घटती है, तो कंपनियों के लिए फंड जुटाने की लागत (Cost of borrowing) बढ़ सकती है, जो सीधे तौर पर इकोनॉमी पर असर डालती है।
बजट 2027 पर टिकी नजरें
इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में पहले ही संकेत दिए गए थे कि डेट सिक्योरिटीज पर टैक्स को युक्तिसंगत (Rationalize) करना जरूरी है। अब सबकी नजरें फरवरी 2027 में आने वाले यूनियन बजट पर हैं। मार्केट पार्टिसिपेंट्स को उम्मीद है कि सरकार डेट और इक्विटी के बीच एक 'लेवल प्लेइंग फील्ड' तैयार करेगी, ताकि एक स्थिर फाइनेंशियल इकोसिस्टम बनाया जा सके।
