Data Center Expansion: भारत के डिजिटल सपने में बाधा, पानी-बिजली की किल्लत और गिरता रुपया बना चुनौती

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AuthorAditya Rao|Published at:
Data Center Expansion: भारत के डिजिटल सपने में बाधा, पानी-बिजली की किल्लत और गिरता रुपया बना चुनौती

भारत **2030** तक **6.5 GW** डेटा सेंटर क्षमता हासिल करने की दौड़ में है, लेकिन अब यह सेक्टर पानी और बिजली की भारी खपत के साथ-साथ गिरते रुपये की मार झेल रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपये का **94.80** के स्तर पर पहुंचना इंपोर्ट कॉस्ट को और महंगा बना रहा है, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय है।

भारत इस वक्त एक बड़े डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के दौर से गुजर रहा है। देश की कुल डेटा सेंटर क्षमता जो 2026 में लगभग 1.5 GW रहने का अनुमान है, वह 2030 तक बढ़कर 6.5 GW तक पहुंचने की राह पर है। इसका एक बड़ा उदाहरण TCS की सब्सिडियरी HyperVault है, जिसने हैदराबाद में 264 एकड़ जमीन पर 1 GW का AI-फोक्स्ड डेटा सेंटर बनाने के लिए ₹70,000 करोड़ का निवेश किया है। हालांकि, यह ग्रोथ जितने बड़े स्तर पर हो रही है, चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी हैं।

ऑपरेशन्ल चुनौती: बढ़ती खपत

डेटा सेंटर्स केवल डिजिटल एसेट नहीं हैं, बल्कि ये बिजली और पानी के बहुत बड़े उपभोक्ता हैं। इंडस्ट्री डेटा के मुताबिक, 100 MW के एक डेटा सेंटर को कूलिंग के लिए रोजाना करीब 20 लाख लीटर पानी की जरूरत होती है। तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख हब में स्थानीय स्तर पर संसाधनों पर पड़ रहे इस दबाव के चलते लोगों का विरोध बढ़ रहा है। अब निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या कंपनियां सस्टेनेबल कूलिंग तकनीक अपना पाती हैं, या फिर उन्हें पर्यावरणीय नियमों की सख्ती और पानी की किल्लत के कारण बढ़ती ऑपरेशनल कॉस्ट का सामना करना पड़ेगा।

आर्थिक दबाव और बढ़ते आयात खर्च

भौतिक संसाधनों के अलावा, कमजोर रुपया डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स की कमर तोड़ रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपया 94.80 के करीब पहुंच चुका है, जिसमें पिछले एक साल में 7% से ज्यादा की गिरावट आई है। चूंकि डेटा सेंटर्स के लिए सर्वर और हार्डवेयर का बड़ा हिस्सा विदेश से इंपोर्ट किया जाता है, इसलिए रुपये की गिरावट से प्रोजेक्ट की लागत सीधे तौर पर बढ़ रही है और मुनाफा मार्जिन घट रहा है।

Moody’s के एनालिस्ट्स का मानना है कि इन प्रोजेक्ट्स में भारी कैपिटल स्पेंडिंग तो हो रही है, लेकिन हाई-वैल्यू इक्विपमेंट के इंपोर्ट पर निर्भरता के कारण इकोनॉमिक लाभ सीमित हैं। निवेशकों के लिए बड़ा रिस्क उन कंपनियों के साथ है, जिनके ऊपर कर्ज का बोझ ज्यादा है और जिनके पास स्थानीय स्तर पर सामान जुटाने (Local Sourcing) की कोई ठोस रणनीति नहीं है। अब देखना यह होगा कि कंपनियां अपनी यूटिलिटी खपत को कैसे मैनेज करती हैं और गिरते रुपये के असर को कैसे बैलेंस करती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.