भारत के लिए चिंता बढ़ाने वाली खबर है। चालू फाइनेंशियल ईयर की पहली छमाही में भारत का क्रूड ऑयल इंपोर्ट बिल **46.3%** उछलकर **$90.6 बिलियन** पहुंच गया है। हैरान करने वाली बात यह है कि तेल की खपत उतनी ही है, लेकिन ग्लोबल मार्केट में कीमतों की आग ने खजाना खाली करना शुरू कर दिया है।
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के ताजा डेटा के मुताबिक, तेल के आयात की मात्रा में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है। पिछले साल जहां 121.8 मिलियन टन तेल मंगाया गया था, वहीं इस बार यह आंकड़ा 122.7 मिलियन टन रहा। साफ है कि बिल में हुआ इजाफा सिर्फ और सिर्फ ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का नतीजा है।
क्यों बढ़ रहे हैं दाम?
वेस्ट एशिया में जारी जियो-पॉलिटिकल टेंशन ने पूरी दुनिया में एनर्जी मार्केट को अस्थिर कर दिया है। सप्लाई चेन में रुकावट के डर से तेल की कीमतों में एक 'रिस्क प्रीमियम' जुड़ गया है। अक्टूबर महीने में भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत $121.25 प्रति बैरल रही, जिसने सरकारी खजाने पर भारी दबाव बनाया है।
इकॉनमी पर इसका असर
भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि कच्चे तेल के दाम में $1 की बढ़त भारत के सालाना इंपोर्ट बिल में लगभग $2 बिलियन का अतिरिक्त बोझ डाल देती है। इससे देश का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) बढ़ता है, जिससे भारतीय रुपये पर दबाव बनना स्वाभाविक है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
पेंट्स, केमिकल्स और रबर जैसे सेक्टर, जो तेल डेरिवेटिव्स पर निर्भर हैं, उनके प्रॉफिट मार्जिन पर खतरा मंडरा रहा है। अगर ये कंपनियां बढ़ती लागत का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल पाईं, तो इनके मुनाफे में बड़ी सेंध लग सकती है। वहीं, निवेशकों की नजर अब Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum जैसी सरकारी तेल कंपनियों पर है। सरकार की रिटेल फ्यूल प्राइसिंग पॉलिसी ही तय करेगी कि इन कंपनियों का मुनाफा आने वाले दिनों में कैसा रहेगा।
