भारत का National Critical Mineral Mission अब खनिजों की खुदाई से आगे बढ़कर औद्योगिक मजबूती पर केंद्रित हो रहा है। इस रणनीति का मुख्य लक्ष्य विदेशी बाजारों पर निर्भरता कम करना और घरेलू स्तर पर हाई-टेक कंपोनेंट्स तैयार करना है।
भारत अपनी संसाधन सुरक्षा के नजरिए को पूरी तरह बदल रहा है। नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन का नया रोडमैप महज कच्चे खनिजों के खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मकसद एक ऐसा घरेलू औद्योगिक आधार बनाना है जो इन खनिजों को हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स में बदल सके। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह बदलाव इसलिए जरूरी है क्योंकि हम अब तक कच्चे संसाधन एक्सपोर्ट करने और रिफाइंड मटेरियल के लिए आयात पर निर्भर रहे हैं।
वैल्यू चेन में ऊपर उठने की चुनौती
भारत के सामने असली चुनौती खनिज भंडारों और उन्हें प्रोसेस करने वाली टेक्नोलॉजी के बीच के गैप को पाटने की है। केवल खनन से आर्थिक मजबूती नहीं आएगी। रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग प्लांट न होने पर खतरा यह है कि भारत ऊर्जा आयात के बाद अब बैटरी मटेरियल, रेयर-अर्थ मैग्नेट और डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए भी दूसरे देशों पर निर्भर हो जाएगा।
ऑपरेशनल ब्लूप्रिंट और इन्वेस्टमेंट
देश के कुछ बड़े औद्योगिक घराने पहले ही 'इंटीग्रेटेड ऑपरेशंस' का मॉडल दिखा चुके हैं। इसमें माइनिंग से लेकर जिंक और एल्युमीनियम जैसे धातुओं की प्रोसेसिंग तक, पूरी सप्लाई चेन को मैनेज किया जाता है। इससे कमोडिटी प्राइस में उतार-चढ़ाव के दौरान होने वाले नुकसान को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। हालांकि, यह सब काफी कैपिटल-इंटेंसिव है। इन प्रोजेक्ट्स में 'जेस्टेशन पीरियड' लंबा होता है, यानी रिटर्न मिलने में सालों लग सकते हैं।
निवेशकों के लिए जोखिम और निगरानी
इस सेक्टर में दिलचस्पी रखने वाले निवेशकों को केवल माइनिंग लाइसेंस तक सीमित नहीं रहना चाहिए। मुख्य जोखिम इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा करने और टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप में है। अगर घरेलू रिफाइनिंग क्षमता स्थापित करने में देरी हुई, तो विदेशी सप्लाई पर निर्भरता बनी रहेगी। भविष्य में सरकार की नई नीतियों और प्राइवेट सेक्टर द्वारा प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश पर निवेशकों की नजरें टिकी रहेंगी।
