पूर्व SEBI अधिकारी Ananth Narayan ने आगाह किया है कि भारत का क्रेडिट मार्केट GDP का महज **65%** है, जो ग्लोबल औसत **140%** से काफी कम है। उन्होंने कहा कि फिक्स्ड इनकम पर भारी टैक्स और RBI के हस्तक्षेप के कारण रिटेल निवेशक जोखिम भरे डेरिवेटिव्स की ओर बढ़ रहे हैं।
आर्थिक ढांचे में बड़ा असंतुलन
मुंबई में आयोजित 13वें SBI बैंकिंग एंड इकोनॉमिक्स कॉन्क्लेव में Ananth Narayan ने भारतीय वित्तीय क्षेत्र की खामियों को उजागर किया। उन्होंने बताया कि अमेरिका में यह आंकड़ा 95% है, जबकि भारत वैश्विक औसत 140% के मुकाबले काफी पीछे है। यह अंतर दर्शाता है कि देश में डेट इंस्ट्रूमेंट्स (Debt Instruments) का आधार बहुत सीमित है।
क्यों इक्विटी की ओर भाग रहे लोग?
FY26 के दौरान, RBI ने सरकारी बॉन्ड्स में ₹8.8 लाख करोड़ सोखे, जो केंद्र सरकार की नेट बॉरोइंग का लगभग 85% है। फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर अधिक टैक्स और इन मौद्रिक नीतियों के चलते पारंपरिक बचत साधन आकर्षक नहीं रह गए हैं। नतीजतन, घरेलू पूंजी तेजी से इक्विटी मार्केट में शिफ्ट हो रही है, जिससे वैल्युएशन पर दबाव बढ़ रहा है।
डेरिवेटिव्स में बढ़ता जोखिम
बाजार में सट्टेबाजी का स्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। आंकड़ों के मुताबिक, इंडेक्स ऑप्शंस में ट्रेड करने वाले 90% रिटेल निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। इनमें से 35% ऐसे हैं जिनके पास कोई अंडरलाइंग शेयर नहीं है, यानी वे सिर्फ सट्टा लगा रहे हैं। एक्सपायरी के दिनों में डेरिवेटिव्स का वॉल्यूम कैश मार्केट से 700 से 1,000 गुना ज्यादा हो जाता है, जो चिंताजनक है।
क्या हैं सुधार के सुझाव?
Ananth Narayan ने सिस्टम को दुरुस्त करने के लिए कुछ बड़े बदलावों की वकालत की है:
- फिक्स्ड-इनकम प्रोडक्ट्स पर टैक्स इंसेंटिव्स को दोबारा संतुलित करना।
- RBI की प्रवर्तन कार्रवाई (Enforcement actions) के लिए SEBI के SAT (Securities Appellate Tribunal) जैसा स्वतंत्र अपीलीय प्राधिकरण बनाना।
- इंडियन बैंक्स एसोसिएशन को लॉबिंग से हटकर सिस्टम में होने वाली गड़बड़ियों पर नजर रखने वाला 'वॉचडॉग' बनाना।
