HSBC इंडिया के CEO, हितेंद्र दवे का कहना है कि भारतीय कॉर्पोरेट जगत अब विस्तार के लिए बैंक से भारी कर्ज़ लेने के बजाय अपनी आंतरिक कैश फ्लो (Internal Cash Flow) का इस्तेमाल कर रहा है। यह **2012-14** के दौर से बिल्कुल अलग तस्वीर है।
कर्ज़ से कैश की ओर बड़ा बदलाव
HSBC इंडिया के CEO, हितेंद्र दवे के अनुसार, भारतीय कंपनियों का अपने विस्तार के लिए कर्ज़ पर निर्भर रहने का दौर अब लगभग खत्म हो गया है। पहले जहां कंपनियां बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए बैंकों से भारी भरकम लोन लेती थीं, वहीं अब टाटा ग्रुप, अडानी और अल्ट्राटेक जैसी बड़ी कंपनियां अपनी कमाई (Internal Cash Flow) से ही विस्तार कर रही हैं।
क्यों यह बदलाव है अहम?
यह बदलाव एक बड़े 'स्ट्रक्चरल चेंज' की ओर इशारा करता है। पहले जब प्रमोटर बहुत कम इक्विटी लगाकर प्रोजेक्ट शुरू करते थे, तो आर्थिक मंदी आने पर उनके पास प्रोजेक्ट को बचाने की प्रेरणा कम होती थी। लेकिन अब जब कंपनियां अपने पैसे लगा रही हैं, तो वे ज़्यादा सावधानी और अनुशासन के साथ काम करेंगी, जो सिस्टम के लिए अच्छा है।
HSBC इंडिया का सपोर्ट और नतीज़े
HSBC इंडिया, जिसका लोकल बैलेंस शीट ₹5 लाख करोड़ के पार जा चुका है, इस बदलाव में अधिग्रहण फाइनेंसिंग (Acquisition Financing) के ज़रिए मदद कर रहा है। बैंक ने 2026 की पहली छमाही में USD 965 मिलियन का प्री-टैक्स प्रॉफिट दर्ज किया, जो पिछले साल की तुलना में 3.65% ज़्यादा है।
निवेशकों के लिए क्या है चिंता?
हालांकि, कॉर्पोरेट बैलेंस शीट मज़बूत हुई हैं, पर कुछ आर्थिक संकेत चिंताजनक हैं। अगस्त 2026 के लिए फ्लैश इंडिया कंपोजिट PMI 54.6 रहा, जो विस्तार दिखा रहा है। पर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में थोड़ी सुस्ती दिख रही है, क्योंकि घरेलू मांग (Domestic Demand) कुछ कम हुई है और लागतें बढ़ी हैं।
इसके अलावा, कैपिटल गुड्स सेक्टर की कई कंपनियों का वैल्यूएशन (Valuation) काफी महंगा हो चुका है। इसलिए, निवेशकों को किसी खास सेक्टर में पैसा लगाने के बजाय, हर कंपनी को अलग से परखना होगा। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव जैसे बाहरी जोखिम भी इनपुट लागत और सेंटीमेंट को प्रभावित कर सकते हैं।
