भारत और दुनिया भर में कॉर्पोरेट कैपिटल स्पेंडिंग (Capex) स्थिर बनी हुई है। निवेश का रुख अब कंपनियों के बजाय रियल एस्टेट जैसे हाउसहोल्ड सेक्टर की ओर शिफ्ट हो रहा है। निवेशकों को अब 'वॉल्यूम ग्रोथ' से ज्यादा 'कैपिटल एफिशिएंसी' पर ध्यान देने की जरूरत है।
भारत में कॉर्पोरेट कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी 'केपेक्स' में बड़ी उछाल न आने की चर्चा अक्सर होती है, लेकिन इसके पीछे की वैश्विक तस्वीर को समझना जरूरी है। अमेरिका, यूके और जर्मनी जैसे विकसित देशों के आंकड़े बताते हैं कि वहां कॉर्पोरेट निवेश लंबे समय से GDP के 12% से 14% के बीच ही अटका हुआ है। यह ट्रेंड भारत के लिए नया नहीं है, बल्कि एक वैश्विक सच्चाई है।
निवेश का बदलता रुख
भारत का कुल इन्वेस्टमेंट-टू-GDP रेशियो 33% के स्वस्थ स्तर पर है, लेकिन इसमें निवेश कहां हो रहा है, इसका पैटर्न बदल गया है। एक दशक पहले, कुल निवेश का आधा हिस्सा कॉर्पोरेट सेक्टर से आता था, जो अब घटकर करीब 45% रह गया है। यह खाली जगह अब हाउसहोल्ड सेक्टर (मुख्य रूप से रेसिडेंशियल रियल एस्टेट) ने ले ली है, जो कुल निवेश का 42-43% हिस्सा है। इसका मतलब है कि पैसा बिजनेस विस्तार के बजाय हाउसहोल्ड एसेट्स में जा रहा है।
वॉल्यूम की जगह एफिशिएंसी क्यों?
निवेशकों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि कंपनियां अपने कैपिटल का उपयोग कितनी कुशलता से कर रही हैं? इसे समझने के लिए 'इन्क्रीमेंटल कैपिटल-आउटपुट रेशियो' (ICOR) को देखें। भारत का यह रेशियो 4.8 है, जो कि अन्य तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के 3.5 के औसत से कम कुशल है। इसका मतलब है कि उतनी ही ग्रोथ हासिल करने के लिए भारतीय कंपनियों को ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। ऐसे में, केवल नए कारखाने लगाने की उम्मीद करने के बजाय, यह देखना ज्यादा फायदेमंद है कि कंपनियां अपनी मौजूदा क्षमता से कितना बेहतर रिटर्न निकाल रही हैं।
कर्ज कम करने का दौर (Deleveraging Cycle)
पिछले 10 वर्षों का एक बड़ा ट्रेंड 'कॉर्पोरेट डेलिवरेजिंग' रहा है। 2011-12 में भारतीय कंपनियों पर कर्ज GDP का 70% था, जो अब गिरकर करीब 50% पर आ गया है। कंपनियां अब आक्रामक विस्तार के बजाय कर्ज चुकाने पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं। मौजूदा वैश्विक अनिश्चितता को देखते हुए कॉर्पोरेट खर्च में अचानक उछाल की संभावना कम है। अब निवेशकों को कंपनियों के Return on Equity (ROE) और Return on Capital Employed (ROCE) जैसे आंकड़ों पर बारीकी से नजर रखनी होगी, ताकि यह पता चल सके कि कौन सी कंपनियां इस सुस्त माहौल में भी बेहतर रिटर्न दे रही हैं।
