भारत में हाई-इंकम यानी अमीर परिवारों का खर्च अब थोड़ा धीमा पड़ रहा है। इसकी मुख्य वजह IT और फाइनेंस जैसे बड़े सेक्टर्स में Hiring का कम होना है। वहीं, AI के चलते लेबर मार्केट में बदलाव और स्किल्स की कमी के कारण पहले जैसी तेज सैलरी ग्रोथ नहीं मिल पा रही है, जो प्रीमियम कंजम्पशन को बढ़ावा देती थी।
क्यों थम रहा है अमीरों का खर्च?
भारत में अमीर ग्राहक, जिनकी सालाना कमाई ₹10 लाख से ज़्यादा है, अब खर्च करने के मामले में थोड़ी नरमी बरत रहे हैं। ये वही लोग हैं जो अब तक देश की इकोनॉमिक ग्रोथ में बड़ा योगदान दे रहे थे, खासकर प्रीमियम कार, लग्जरी ट्रैवल और महंगे फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स की डिमांड बढ़ाकर। लेकिन अब इस ग्रोथ की रफ्तार धीमी पड़ती दिख रही है, जो उन कंपनियों के लिए एक नई चुनौती है जो प्रीमियम सेगमेंट से तेजी से कमाई करने की आदी थीं।
लेबर मार्केट में बड़े बदलाव
इस पूरे बदलाव की जड़ें लेबर मार्केट में हैं। हाई-इंकम कंजम्पशन सीधे तौर पर IT और फाइनेंस सेक्टर में होने वाली Hiring से जुड़ा है, जो Nifty 500 इंडेक्स के बड़े एम्प्लॉयर हैं। हाल के दिनों में इन सेक्टर्स ने Hiring कम कर दी है, जिससे पोस्ट-पैंडेमिक पीक के मुकाबले सैलरी ग्रोथ धीमी हो गई है।
Artificial Intelligence (AI) को लेकर अक्सर नौकरियों के जाने की बातें होती हैं, लेकिन भारत में इसका असर थोड़ा अलग है। एनालिस्ट्स के आंकड़ों के मुताबिक, AI फिलहाल एम्प्लॉयमेंट के लिए नेट पॉजिटिव है, यानी यह जितनी नौकरियां खत्म कर रहा है, उससे ज़्यादा बना रहा है। मगर, एक बड़ी समस्या 'स्किल्स गैप' की है। जिन लोगों की जॉब्स ऑटोमेट हो रही हैं, वे अक्सर उन नई AI-आधारित पोजिशन्स के लिए जरूरी स्किल्स से लैस नहीं हैं। यह मिसमैच जॉब मार्केट में रुकावट पैदा कर रहा है और हाई-इंकम ब्रैकेट के विस्तार को सीमित कर रहा है, जिस पर बिजनेस निर्भर करते हैं।
'K-शेप रिकवरी' पर सवाल?
इस ट्रेंड के कारण इन्वेस्टर्स 'K-शेप रिकवरी' पर फिर से विचार कर रहे हैं। यह वह स्थिति है जहां अमीर वर्ग तो फलता-फूलता रहा, जबकि बाकी वर्ग संघर्ष करता रहा। अब यह गैप कम हो रहा है। अमीरों के खर्चे धीमे होने के साथ-साथ, मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन और सरकारी पहलों से सपोर्टेड मास कंजम्पशन सेक्टर्स में सुधार के संकेत दिख रहे हैं। खासतौर पर मल्टीनेशनल कंपनियां, अपने ग्लोबल सप्लाई चेन्स को नई टेक्नोलॉजी के हिसाब से ढालने के लिए, डोमेस्टिक कंपनियों के मुकाबले ज्यादा तेजी से Hiring कम करती दिख रही हैं।
इन्वेस्टर्स के लिए क्या है मायने?
इन्वेस्टर्स के लिए इसके मायने कई सेक्टर्स में हैं। प्राइवेट सेक्टर के बैंक और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस, जिन्होंने हाई-इंकम कस्टमर्स से बड़े लोन बुक बढ़ाए थे, अब इन ट्रेंड्स पर बारीकी से नजर रख रहे हैं। अगर नए अमीर ग्राहक धीरे-धीरे जुड़ते रहे, तो यह आखिरकार होम लोन और प्रीमियम व्हीकल फाइनेंसिंग जैसे बड़े टिकट लोन की डिमांड पर दबाव डाल सकता है।
आगे चलकर, मार्केट के लिए सिर्फ टोटल एम्प्लॉयमेंट नंबर्स ही नहीं, बल्कि Hiring की क्वालिटी और स्किल्ड व्हाइट-कॉलर प्रोफेशनल्स की सैलरी ग्रोथ को मॉनिटर करना जरूरी होगा। अगर प्रीमियम सेगमेंट सावधानी दिखाता है, तो इन्वेस्टर्स रिटेल, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और प्राइवेट बैंकिंग जैसे सेक्टर्स की कंपनियों की स्ट्रैटेजी में बदलाव पर नजर रख सकते हैं। लेबर मार्केट का मौजूदा स्किल्स गैप को पाटना, इस बात का अहम फैक्टर होगा कि अमीरों के खर्च में यह नरमी एक अस्थायी एडजस्टमेंट है या कंजम्पशन पैटर्न में एक स्थायी बदलाव।
