इस फाइनेंशियल ईयर (FY27) की पहली चार महीनों में भारतीय कंपनियों को मिलने वाले फंड में ज़बरदस्त उछाल आया है। कुल इनफ्लो **2.38 गुना** बढ़कर **₹10.65 लाख करोड़** तक पहुंच गया है। इस बंपर ग्रोथ की सबसे बड़ी वजह नॉन-फूड बैंक क्रेडिट में आई **9 गुना** की तेजी है। हालांकि, यह मजबूत बिजनेस डिमांड का संकेत है, लेकिन क्रेडिट ग्रोथ और डिपॉजिट कलेक्शन के बीच बढ़ता अंतर बैंकिंग सेक्टर के लिए एक बड़ा जोखिम पैदा कर रहा है।
रिकॉर्ड तोड़ फंड इनफ्लो: क्या है वजह?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, चालू फाइनेंशियल ईयर (FY27) की पहली चार महीनों में देश के कमर्शियल सेक्टर में वित्तीय संसाधनों का प्रवाह बढ़कर ₹10.65 लाख करोड़ हो गया है। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा ₹4.48 लाख करोड़ था, यानी इसमें 2.38 गुना की बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
इस रिकॉर्ड तोड़ इनफ्लो का मुख्य कारण नॉन-फूड क्रेडिट रहा है। ये वो लोन हैं जो व्यवसायों और व्यक्तियों को गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए दिए जाते हैं। इस साल अप्रैल से जुलाई के बीच इसमें लगभग 9.16 गुना का इजाफा देखा गया, जो पिछले साल के ₹73,000 करोड़ की तुलना में बढ़कर ₹6.69 लाख करोड़ हो गया है। यह दिखाता है कि इंडस्ट्रीज, सर्विसेज और पर्सनल लोन लेने वालों की ओर से क्रेडिट की मांग काफी बढ़ी है।
बैंकिंग सेक्टर पर दबाव और डिपॉजिट ग्रोथ की चुनौती
क्रेडिट में इतनी तेज बढ़ोतरी से इकोनॉमी में अच्छी रफ्तार का संकेत तो मिलता है, लेकिन बैंकों के लिए यह एक मुश्किल स्थिति पैदा कर रहा है। 31 जुलाई 2026 तक, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (Scheduled Commercial Banks) के लिए क्रेडिट ग्रोथ साल-दर-साल 19.3% रही, जबकि डिपॉजिट ग्रोथ 15.4% पर ही सिमट गई।
इस अंतर के कारण क्रेडिट-डिपॉजिट (CD) रेशियो लगभग 82% पर पहुंच गया है, जो पिछले करीब एक दशक का सबसे ऊंचा स्तर है। निवेशकों के लिए यह रेशियो अहम है क्योंकि यह दर्शाता है कि बैंक डिपॉजिट जमा करने से ज्यादा तेजी से लोन बांट रहे हैं। जब CD रेशियो इतना हाई हो जाता है, तो बैंकों के लिए नए लोन को फंड करना मुश्किल और महंगा हो जाता है। इस गैप को भरने के लिए, बैंकों को ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए डिपॉजिट पर ऊंची ब्याज दरें देनी पड़ सकती हैं, जिससे आने वाली तिमाहियों में उनके नेट प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है।
सेक्टर-वार डिमांड और भविष्य का अनुमान
बैंकों ने लगभग सभी कैटेगरी में मजबूत डिमांड दर्ज की है। कृषि, बड़ी इंडस्ट्रीज और सर्विसेज सेक्टर (NBFCs और कमर्शियल रियल एस्टेट से सपोर्टेड) में क्रेडिट फ्लो मजबूत बना रहा। हाउसिंग और गोल्ड ज्वैलरी जैसे पर्सनल लोन में भी बढ़ोतरी देखी गई है।
आगे चलकर, FY27 के दूसरे हाफ में क्रेडिट ग्रोथ की रफ्तार थोड़ी धीमी हो सकती है। इसकी एक वजह बेस इफेक्ट (पिछले साल के बड़े आंकड़ों के मुकाबले ग्रोथ की गणना) और कॉर्पोरेट लोन की मांग में संभावित नरमी है।
निवेशकों को बैंकों की डिपॉजिट जुटाने की कोशिशों पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए। बैंकों की अपनी डिपॉजिट बेस बढ़ाने की क्षमता ही यह तय करेगी कि वे प्रॉफिट मार्जिन को ज्यादा नुकसान पहुंचाए बिना मौजूदा लेंडिंग वॉल्यूम को बनाए रख पाते हैं या नहीं। इसके अलावा, भले ही एक्सटर्नल कमर्शियल बोर्रोइंग (ECB) से कुछ सहारा मिलने की उम्मीद है (FY27 के लिए $75–80 बिलियन अनुमानित), लेकिन बैंकिंग स्थिरता के लिए डोमेस्टिक डिपॉजिट मार्केट ही सबसे अहम फैक्टर बना रहेगा।
