भारत की पहली डिजिटल जनगणना फिलहाल हाउस-लिस्टिंग फेज में है, लेकिन जातिगत डेटा को लेकर बड़ी तकनीकी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि ओपन-एंडेड सवालों के कारण डेटा बिखरा हुआ और बेकार हो सकता है।
भारत की 16वीं जनगणना इस समय पूरी तरह से डिजिटल मोड में चल रही है। हाउस-लिस्टिंग और हाउसिंग सेंसस का काम जोरों पर है, जो सितंबर 2026 तक पूरा होना है। लेकिन इस पूरी कवायद में जातिगत डेटा इकट्ठा करने का तरीका अब विवाद और चर्चा का केंद्र बन गया है।
डेटा की शुद्धता पर बड़ा सवाल
सरकार ने जाति की जानकारी के लिए 'ओपन-एंडेड' सवाल का तरीका अपनाया है। यानी, इसके लिए कोई फिक्स्ड लिस्ट या ड्रॉप-डाउन मेन्यू नहीं है। एक्सपर्ट्स और सांख्यिकीविदों (Statisticians) को डर है कि अलग-अलग वर्तनी (Spellings) और क्षेत्रीय बोलियों की वजह से जानकारी इतनी बिखरी हुई होगी कि उसे राष्ट्रीय स्तर पर जोड़ना नामुमकिन होगा। यह स्थिति 2011 के Socio-Economic and Caste Census (SECC) जैसी हो सकती है, जहां करोड़ों प्रविष्टियां (entries) वर्गीकरण के लिए बहुत जटिल साबित हुई थीं।
माइग्रेशन और क्लासिफिकेशन की चुनौती
देश में बड़ी संख्या में लोग एक राज्य से दूसरे राज्य में बसते हैं। चूँकि जातियों का वर्गीकरण राज्य दर राज्य बदलता है, इसलिए एक नेशनल फ्रेमवर्क न होने पर डेटा के 'मिसक्लासिफाई' होने का खतरा है। ऐसे में लोग या तो गलत कैटेगरी में चले जाएंगे या फिर उन्हें 'अन्य' (Others) की श्रेणी में डाल दिया जाएगा।
अगले कदम पर नज़र
1.4 अरब से अधिक की आबादी पर यह एक्सरसाइज बेहद चुनौतीपूर्ण है। सरकार ने काम को आसान बनाने के लिए Census Management and Monitoring System (CMMS) पोर्टल और मोबाइल ऐप्स का सहारा लिया है। हालांकि, इसकी असली सफलता फरवरी 2027 में शुरू होने वाले 'पॉपुलेशन एन्यूमरेशन' फेज में तय होगी। आने वाले महीनों में देखना यह होगा कि क्या सरकार डेटा को व्यवस्थित करने के लिए कोई औपचारिक क्लासिफिकेशन मैकेनिज्म लाती है या फिर भविष्य की नीतियां, रिजर्वेशन और संसाधन आवंटन अनिश्चित डेटा पर आधारित होंगे।
