निवेश बैंकिंग की धूम! भारतीय ग्रेजुएट्स क्यों छोड़ रहे मैन्युफैक्चरिंग जैसे ज़रूरी सेक्टर्स?

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
निवेश बैंकिंग की धूम! भारतीय ग्रेजुएट्स क्यों छोड़ रहे मैन्युफैक्चरिंग जैसे ज़रूरी सेक्टर्स?

भारत के टॉप कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने वाले ग्रेजुएट्स अब फाइनेंस और कंसल्टिंग जैसे हाई-पेइंग और ग्लैमरस जॉब्स की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि मैन्युफैक्चरिंग और रिस्क मैनेजमेंट जैसे ज़रूरी सेक्टर्स में टैलेंट की भारी कमी हो रही है। यह ट्रेंड दिखाता है कि स्टूडेंट्स की पहली पसंद ज़्यादा सैलरी वाली नौकरियां हैं, भले ही लॉन्ग-टर्म ग्रोथ के अवसर कहीं और हों। एक्सपर्ट्स की मानें तो स्टूडेंट्स अक्सर कम भीड़ वाले सेक्टर्स को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जिनमें ज़्यादा स्टेबिलिटी और भविष्य में बेहतर डिमांड होती है।

फाइनेंस की नौकरियों का क्रेज़ क्यों?

भारत के टॉप एजुकेशनल इंस्टीट्यूट्स में एक दिलचस्प ट्रेंड देखने को मिल रहा है। यहाँ के ग्रेजुएट्स अब कुछ खास तरह की करियर फील्ड्स को लेकर ज़्यादा उत्साहित हैं। इन्वेस्टमेंट बैंकिंग, इक्विटी रिसर्च और कंसल्टिंग फर्म्स में एप्लीकेशन्स की बाढ़ आ गई है। स्टूडेंट्स ऐसी हाई-पेइंग पोजीशंस के लिए कॉम्पिटिशन कर रहे हैं, जहाँ उन्हें अच्छी पहचान और रुतबा मिले।

ऊँची ट्यूशन फीस, जैसे कि पुराने IIMs में ₹25 लाख से ₹28 लाख तक, के चलते नए ग्रेजुएट्स पर जल्दी अच्छी सैलरी वाली जॉब्स पाने का दबाव भी बढ़ रहा है। इस वजह से ज़्यादातर टैलेंटेड युवा सिर्फ कुछ गिनी-चुनी पोजीशंस पर ही फोकस कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, कुछ बड़े म्यूचुअल फंड्स में यह देखा गया है कि 85% एप्लीकेंट्स एक ही तरह की इक्विटी रिसर्च और इन्वेस्टिंग पोजीशंस के लिए अप्लाई कर रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि इन स्पेसिफिक फील्ड्स में वैकेंसीज लिमिटेड हैं, जबकि ऑपरेशंस, सेल्स और कंप्लायंस जैसे ब्रॉडर रोल्स में ज़्यादा मौके मौजूद हैं।

ज़रूरी सेक्टर्स को अनदेखा करने का जोखिम

जहाँ एक तरफ ग्रेजुएट्स 'ग्लैमरस' जॉब टाइटल्स के पीछे भाग रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मैन्युफैक्चरिंग, रिस्क मैनेजमेंट और डेरिवेटिव ऑपरेशंस जैसे ज़रूरी सेक्टर्स क्वालिटी टैलेंट को अट्रैक्ट करने के लिए स्ट्रगल कर रहे हैं। इससे इकोनॉमी में असंतुलन पैदा हो रहा है। जब बहुत ज़्यादा स्किल्ड प्रोफेशनल्स कंसल्टिंग या ट्रेडिंग में चले जाते हैं, तो ज़रूरी इकोनॉमिक सेक्टर्स की कंपनियों को ग्रोथ के लिए क्रिटिकल पोजीशंस भरने में मुश्किल होती है।

एडेलवाइस म्यूचुअल फंड की CEO, राधिका गुप्ता जैसे इंडस्ट्री लीडर्स ने स्टूडेंट्स को इन रोल्स के इमीडिएट आकर्षण से आगे देखने की सलाह दी है। उनका सुझाव है कि लॉन्ग-टर्म सक्सेस अक्सर उन एरियाज़ में ज़्यादा मिलती है जहाँ कॉम्पिटिशन कम हो और भविष्य में डिमांड बढ़ने की संभावना हो। जैसे कि प्राइवेट डेट, इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स और पब्लिक वेल्थ मैनेजमेंट।

हायरिंग पैटर्न्स में बदलाव

भले ही स्टूडेंट्स पारंपरिक फाइनेंस रोल्स पर फोकस कर रहे हों, लेकिन वाइडर जॉब मार्केट तेज़ी से बदल रहा है। उदाहरण के लिए, IT सर्विसेज सेक्टर में कंपनियाँ अब बड़े पैमाने पर हायरिंग से हटकर स्पेशलाइज्ड रिक्रूटमेंट पर ध्यान दे रही हैं। वे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसे स्किल्स के लिए टैलेंट ढूंढ रही हैं। यह दर्शाता है कि टैलेंट की मार्केट वैल्यू जनरल प्रोफाइल्स के बजाय खास टेक्निकल स्किल्स की ओर बढ़ रही है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि भले ही सैलरी एक ज़रूरी कंसर्न है, लेकिन स्किल्स को एक्चुअल मार्केट डिमांड के साथ अलाइन करना लॉन्ग-टर्म करियर स्टेबिलिटी के लिए सबसे ज़रूरी है। जैसे-जैसे स्टूडेंट्स सोशल स्टेटस और इमीडिएट पे को प्राथमिकता दे रहे हैं, वैसे-वैसे ग्रेजुएट्स की चाहत और इकोनॉमी की ज़रूरत के बीच का गैप बढ़ता जा रहा है। इन्वेस्टर्स और इंडस्ट्री ऑब्ज़र्वर्स इस ट्रेंड पर नज़र रखेंगे कि क्या ई-कॉमर्स, टेक्नोलॉजी और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर्स में हायरिंग की डिमांड बढ़ने पर यह ट्रेंड बदलेगा, जिससे शायद कैंपस रिक्रूटमेंट की डायनामिक्स में भी बदलाव आए।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.