CSR Spending: भारत में CSR का नया रिकॉर्ड, लेकिन क्या अमीर राज्यों को ही मिल रहा है फायदा?

ECONOMY
Whalesbook Logo
AuthorMehul Desai|Published at:
CSR Spending: भारत में CSR का नया रिकॉर्ड, लेकिन क्या अमीर राज्यों को ही मिल रहा है फायदा?

कॉर्पोरेट इंडिया का CSR खर्च FY2024-25 में **17%** बढ़कर रिकॉर्ड **₹40,794 करोड़** पर पहुंच गया है। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश बढ़ा है, लेकिन डेटा बताता है कि पैसा ज्यादातर विकसित राज्यों में ही जा रहा है, जबकि पिछड़े क्षेत्र उपेक्षित हैं।

खर्च में बड़ा उछाल, पर असमानता बरकरार

वित्तीय वर्ष 2024-25 में CSR के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला। कुल 29,546 कंपनियों ने सामाजिक जिम्मेदारी के तहत ₹40,794 करोड़ का निवेश किया है। हालांकि, आंकड़े चौंकाने वाले हैं। प्रति व्यक्ति आय और CSR फंड मिलने के बीच +0.71 का कोरिलेशन (Correlation) है, जिसका मतलब है कि पैसा उन्हीं राज्यों में जा रहा है जो पहले से ही आर्थिक रूप से मजबूत हैं। मिसाल के तौर पर, अकेले महाराष्ट्र को ही ₹8,631 करोड़ का फंड मिला है।

किन क्षेत्रों में हुआ खर्च?

कंपनियों का मुख्य फोकस अब भी पारंपरिक क्षेत्रों पर है:

  • शिक्षा (Education): कुल खर्च का 34% यानी ₹13,877 करोड़
  • स्वास्थ्य (Healthcare): 21% हिस्सेदारी के साथ ₹8,531 करोड़
  • पर्यावरण (Environment): इसमें 40% की शानदार बढ़ोतरी देखी गई, जो कुल ₹3,397 करोड़ रहा।

भविष्य की राह और निवेशकों के लिए संकेत

सरकार अब इस बात पर विचार कर रही है कि कैसे इन फंड्स को उन जिलों (Aspirational Districts) तक पहुंचाया जाए जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। कंपनियां अक्सर अपने हेडक्वार्टर के पास ही प्रोजेक्ट लगाना पसंद करती हैं, लेकिन अब Companies Act की धारा 135 के तहत नियमों में बदलाव की सुगबुगाहट है।

निवेशकों के लिए सबसे बड़ा अपडेट NSE Social Stock Exchange है। चूंकि अब सालाना CSR कॉर्पस का 10% यहां रूट करना अनिवार्य है, इसलिए आने वाले समय में कंपनियों को अपनी सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के 'इम्पैक्ट' का हिसाब-किताब पहले से कहीं ज्यादा पारदर्शिता के साथ देना होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.