ट्रेड डील्स की चमक के पीछे बॉन्ड मार्केट की सुस्ती?
एक तरफ जहाँ भारत अमेरिका जैसे देशों के साथ ट्रेड एग्रीमेंट करके अपनी इकोनॉमी को मज़बूत करने और कैपिटल फॉर्मेशन को बढ़ाने की उम्मीद कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ देश का अपना बॉन्ड मार्केट कई गंभीर दिक्कतों से जूझ रहा है। सेबी (SEBI) के चेयरमैन तुहिन कांता पांडे ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इन सब के बावजूद, इंडिया का कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट डेप्थ (Market Depth) के मामले में अभी भी काफी पीछे है। देश की जीडीपी (GDP) के मुकाबले यह केवल 15-16% है, जबकि साउथ कोरिया जैसे देश 79% और मलेशिया 54% की गहराई रखते हैं।
इन्वेस्टर अवेयरनेस का बड़ा गैप
बाजार को गहरा करने और रिटेल निवेशकों तक पहुँच को आसान बनाने के लिए सेबी और आरबीआई (RBI) ने मिनिमम इन्वेस्टमेंट की सीमा घटाकर ₹10,000 कर दी है। मगर, इन्वेस्टर अवेयरनेस (Investor Awareness) एक बड़ी रुकावट बनी हुई है। सेबी के एक सर्वे से पता चला है कि कॉर्पोरेट बॉन्ड्स के बारे में सिर्फ 10% निवेशकों को ही जानकारी है, जो कि क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency) जैसे नए एसेट क्लास के बारे में 15% लोगों की जानकारी से भी कम है।
गवर्नमेंट बॉन्ड्स पर सप्लाई का दबाव
इसके अलावा, गवर्नमेंट बॉन्ड मार्केट (Government Bond Market) पर सप्लाई ओवरहैंग (Supply Overhang) का भी बड़ा दबाव है। अगले फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में ग्रॉस बॉरोइंग्स (Gross Borrowings) ₹30 ट्रिलियन से ज़्यादा रहने का अनुमान है, जिसके चलते म्यूचुअल फंड्स (Mutual Funds) गवर्नमेंट सिक्योरिटीज (Government Securities) की नेट सेल (Net Sell) कर रहे हैं। वहीं, ग्लोबल स्तर पर कैपिटल फ्लोज़ (Capital Flows) में भी काफी उठापटक देखने को मिली है। साल 2025 में इंडिया से $18.4 बिलियन का नेट फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट (FPI) आउटफ्लोज़ (Outflows) हुआ है।
कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट की ग्रोथ और चुनौतियाँ
पिछले एक दशक में कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट में 12% की एनुअल ग्रोथ रेट (Annual Growth Rate) से बढ़ोतरी हुई है और यह ₹53.6 ट्रिलियन तक पहुँच गया है। लेकिन, इश्यूअर बेस (Issuer Base) बहुत संकरा है, जो ज़्यादातर टॉप-रेटेड कंपनियों तक सीमित है। इससे छोटी कंपनियों के लिए फंड जुटाना मुश्किल होता है और मार्केट लिक्विडिटी (Liquidity) भी कम रहती है।
डेरिवेटिव्स पर सेबी का सधा कदम
बाजार में वोलेटिलिटी (Volatility) को कम करने के लिए, सेबी ने डेरिवेटिव एक्सपायरीज़ (Derivative Expiries) को स्ट्रीमलाइन किया है। रेगुलेटर वीकली एक्सपायरीज़ (Weekly Expiries) पर स्टेटस क्यू (Status Quo) बनाए रखने के पक्ष में है। इस कदम का मकसद स्पेकुलेटिव एक्सेस (Speculative Excesses) को रोकना है, हालाँकि इससे मार्केट डीपनिंग (Market Deepening) के मौकों पर भी असर पड़ सकता है।
आगे की राह: उम्मीदें और हकीकत
गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) का अनुमान है कि बेहतर ट्रेड संभावनाओं और कम अनिश्चितता के चलते इंडिया की जीडीपी ग्रोथ 2026 में 6.9% तक पहुँच सकती है। एनालिस्ट्स (Analysts) कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट में लगातार ग्रोथ की उम्मीद कर रहे हैं, खासकर ग्लोबल इंडेक्स इन्क्लूज़न (Global Index Inclusion) से फॉरेन इनफ्लोज़ (Foreign Inflows) आकर्षित होने की संभावना है। लेकिन, इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह कैपिटल फॉर्मेशन (Capital Formation) डोमेस्टिक मार्केट को मज़बूत कर पाएगा? जब तक देश का कैपिटल मार्केट्स (Capital Markets) इन स्ट्रक्चरल इम्पेडिमेंट्स (Structural Impediments) को दूर नहीं करता और इन्वेस्टर एजुकेशन (Investor Education) को बेहतर नहीं बनाता, तब तक ट्रेड डील्स का पूरा फायदा उठाना मुश्किल होगा। सेबी का डेरिवेटिव्स (Derivatives) में डेटा-ड्रिवन रेगुलेशन (Data-driven Regulation) का वादा एक सधा हुआ कदम दिखाता है, जो मार्केट स्टेबिलिटी (Market Stability) को प्राथमिकता देता है।
