SEBI चेयरमैन का आह्वान: बॉन्ड मार्केट को बनाएं विकास का मुख्य आधार!
सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) के चेयरमैन तुहिन कांता पांडे ने साफ कर दिया है कि देश के आर्थिक विकास को रफ़्तार देने के लिए केवल बैंक लोन पर निर्भर रहना काफी नहीं है। खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर, ग्रीन ट्रांजिशन, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज जैसे अहम क्षेत्रों को फंड करने के लिए कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट को एक लीडिंग रोल निभाना होगा। भारत की GDP पिछले तीन सालों से औसतन 7.8% की दर से बढ़ रही है, और फाइनेंशियल ईयर 2026 के लिए भी यह 7.4% रहने का अनुमान है। इसके बावजूद, भारत का कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट अभी भी काफी अविकसित है। यह फिलहाल GDP का मात्र 16% है, जबकि साउथ कोरिया जैसे देश 79%, मलेशिया 54% और चीन 38% तक पहुँच चुके हैं। यह एक बड़ी संरचनात्मक कमी है, जो भारत के महत्वाकांक्षी आर्थिक लक्ष्यों, जैसे 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की इकॉनमी बनने, के लिए जरूरी फंडिंग में बाधा डाल रही है।
'वैल्यूएशन गैप': बॉन्ड मार्केट की छुपी क्षमता
लगातार GDP ग्रोथ और रिकॉर्ड डेट इश्यूएंश (Debt Issuances) के बावजूद, जहाँ फाइनेंशियल ईयर 2025 में कंपनियों ने लगभग ₹10 लाख करोड़ जुटाए, वहीं बॉन्ड मार्केट की इकॉनमी में पैठ अभी भी कमजोर है। दिसंबर 2025 तक, आउटस्टैंडिंग कॉर्पोरेट बॉन्ड्स की कुल वैल्यू लगभग ₹58 लाख करोड़ (या FY25 तक ₹53.6 ट्रिलियन) थी। पिछले एक दशक में इनमें 12% की CAGR से बढ़ोतरी हुई है। यह वॉल्यूम, जो कि इंडस्ट्री और सर्विसेज को बैंक क्रेडिट का लगभग 60% है, महत्वपूर्ण है, लेकिन अभी भी क्षमता से काफी कम है। इसकी एक बड़ी वजह इश्यूअर बेस का संकरा होना है। 5600 से अधिक लिस्टेड कंपनियों में से केवल 770 ही डेट के जरिए फंड जुटा पाई हैं, और इनमें से भी केवल 272 कंपनियों ने एक से अधिक बार डेट इश्यू किया है। इसका मतलब है कि मार्केट मुख्य रूप से हाई-रेटेड बड़ी कंपनियों को ही सेवा दे पा रहा है, जबकि छोटी और उभरती हुई कंपनियों को अभी भी बैंक फाइनेंसिंग पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जिसकी ग्रोथ फाइनेंशियल ईयर 2025 में सिर्फ 6.9% रही।
अंदरूनी चुनौतियाँ: बॉन्ड मार्केट के रास्ते में रोड़े
कई गहरी जड़ें जमा चुकी दिक्कतें बॉन्ड मार्केट के विकास को रोक रही हैं। सबसे बड़ी समस्या इन्वेस्टर अवेयरनेस की कमी है। केवल 10% लोग ही कॉर्पोरेट बॉन्ड्स को इन्वेस्टमेंट व्हीकल (Investment Vehicle) के तौर पर समझते हैं, जबकि क्रिप्टो करेंसी के बारे में 15% लोग जानते हैं। इस कम जानकारी की वजह से डिमांड सीमित है। इसके अलावा, पेंशन और इंश्योरेंस फंड जैसे इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (Institutional Investors) अक्सर रेगुलेटरी इनर्शिया (Regulatory Inertia) के चलते सुरक्षित, हाई-रेटेड इन्वेस्टमेंट के नियमों से बंधे होते हैं, जो मार्केट की गहराई और रिस्क लेने की क्षमता को सीमित करता है। सेकेंडरी मार्केट लिक्विडिटी (Secondary Market Liquidity) भी एक बड़ी बाधा है। 90% से ज्यादा इश्यूएंश प्राइवेट प्लेसमेंट (Private Placement) के जरिए होती हैं। यह छोटे, नेगोशिएटेड डील्स के लिए तो अच्छा है, लेकिन प्राइस डिस्कवरी (Price Discovery) को रोकता है और आम इन्वेस्टर्स के लिए बॉन्ड्स को ट्रेड करना मुश्किल बना देता है। मार्केट बहुत ज्यादा हाई-रेटेड इश्यूअर्स (AAA या AA-रेटेड) की ओर झुका हुआ है, जो इश्यूएंश का 85-90% बनाते हैं। यह अमेरिका जैसे बाजारों के विपरीत है, जहाँ 5% से भी कम इश्यूएंश AAA-रेटेड होते हैं। यह ढाँचा बैंकों पर निर्भरता बढ़ाता है और भारतीय व्यवसायों की एक बड़ी रेंज के लिए कैपिटल एक्सेस (Capital Access) सीमित करता है। मार्केट-मेकिंग (Market-Making) को बढ़ावा देना और कम-रेटेड इश्यूअर्स के लिए क्रेडिट एनहांसमेंट (Credit Enhancements) जैसे उपाय जरूरी हैं, लेकिन उनके इम्प्लीमेंटेशन में अभी भी दिक्कतें हैं।
भविष्य की राह: मार्केट-संचालित अर्थव्यवस्था की ओर
SEBI का बॉन्ड्स को मुख्य फंडिंग टूल बनाने का प्रस्ताव, मार्केट-बेस्ड फाइनेंसिंग (Market-Based Financing) की ओर एक स्ट्रैटेजिक रीओरिएंटेशन (Strategic Reorientation) का संकेत देता है। यह भारत के 'विकसित भारत 2047' जैसे लॉन्ग-टर्म विज़न (Long-Term Vision) के अनुरूप है, जिसके लिए एक मजबूत और डाइवर्सिफाइड कैपिटल मार्केट की जरूरत है। रेगुलेटरी कोऑर्डिनेशन (Regulatory Coordination) और डेट इंस्ट्रूमेंट्स (Debt Instruments) के टैक्स ट्रीटमेंट (Tax Treatment) को तर्कसंगत बनाना जैसे संभावित रिफॉर्म्स (Reforms) प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और भागीदारी बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। इन उपायों की सफलता ही तय करेगी कि क्या भारत अपने कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट का पूरी तरह से लाभ उठाकर अपनी महत्वाकांक्षी ग्रोथ की राह को फंड कर सकता है, बैंकों में केंद्रित सिस्टमैटिक रिस्क (Systemic Risk) को कम कर सकता है, और अपनी बढ़ती इकॉनमी के लिए ओवरऑल कॉस्ट ऑफ कैपिटल (Cost of Capital) को घटा सकता है।
