भारत का बैटरी रीसाइक्लिंग सेक्टर बड़े निवेश के बावजूद कच्चे माल (Feedstock) की भारी कमी से जूझ रहा है। अनौपचारिक स्क्रैप मार्केट के दबदबे और कम प्रॉफिट वाली बैटरी केमिस्ट्री के कारण कंपनियों के सामने बिजनेस मॉडल को टिकाऊ बनाए रखने की चुनौती बढ़ गई है।
भारत का बैटरी रीसाइक्लिंग हब बनने का सपना एक बड़े रियलिटी चेक से गुजर रहा है। हालांकि इस सेक्टर में ₹5,000 करोड़ से ज्यादा का निवेश किया गया है और 2026 की शुरुआत तक 8.5 लाख टन की वार्षिक प्रोसेसिंग क्षमता तैयार करने का लक्ष्य है, लेकिन हकीकत में बुनियादी ढांचे और सप्लाई के बीच बड़ी खाई नजर आ रही है। कई नए प्लांट्स केवल मैकेनिकल श्रेडिंग पर आधारित हैं, जिनमें हाई-प्यूरिटी मिनरल्स निकालने वाली केमिकल रिकवरी क्षमता का अभाव है। कच्चे माल की निरंतर सप्लाई न मिलने से ये प्लांट अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहे हैं।
अनौपचारिक सेक्टर (Informal Sector) का दबदबा
फॉर्मल रीसाइकलर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती गली-मोहल्लों के स्क्रैप डीलर्स हैं। ई-वेस्ट का बड़ा हिस्सा अभी भी अनौपचारिक नेटवर्क के पास ही जा रहा है। सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के पास कागजों पर तो क्षमता बहुत है, लेकिन असल में कचरा फॉर्मल चैनल्स तक पहुंच ही नहीं रहा है। इस कारण कंपनियों को फीडस्टॉक के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है, जिससे उनका बिजनेस मॉडल महंगा साबित हो रहा है।
बैटरी केमिस्ट्री और मार्जिन का गणित
बैटरी का प्रकार भी मुनाफे पर सीधा असर डाल रहा है। निकेल और कोबाल्ट वाली बैटरी में मार्जिन अच्छा है, लेकिन बाजार में अब लिथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) बैटरी की संख्या बढ़ रही है। इनमें कीमती मेटल्स कम होने से रीसाइकलर्स की लागत बढ़ जाती है। इसके अलावा, मैन्युफैक्चरर्स पर लागू होने वाले EPR (Extended Producer Responsibility) नियमों की अनुपालन लागत भी प्रॉफिटेबिलिटी पर दबाव डाल रही है।
रेगुलेटरी बदलाव और भविष्य की राह
पारदर्शिता लाने के लिए सरकार ने GST-लिंक्ड ई-इनवॉइस अनिवार्य कर दिया है ताकि EPR सर्टिफिकेट्स में धोखाधड़ी न हो। FY2027-28 तक सरकार ने नई बैटरियों में रीसाइकल्ड मटेरियल का उपयोग करने का कड़ा लक्ष्य रखा है। अब कंपनियों को सिर्फ प्लांट लगाने के बजाय एक मजबूत और टिकाऊ सप्लाई चेन बनाने पर जोर देना होगा, ताकि इस उभरते सेक्टर में लंबी अवधि तक टिके रह सकें।
