भारत की कृषि नीति फिलहाल लंबी अवधि की स्थिरता के बजाय केवल फसल उत्पादन पर ध्यान दे रही है, जिससे पर्यावरण को सालाना **$1.3 ट्रिलियन** का छिपा हुआ नुकसान हो रहा है।
भारतीय कृषि सेक्टर में अब फसल की पैदावार और प्राकृतिक संसाधनों की सेहत के बीच एक गहरी खाई बन गई है। फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (FAO) के आंकड़ों के मुताबिक, देश के एग्री-फूड सिस्टम से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान, जैसे कि ग्राउंडवॉटर (Groundwater) में कमी, मिट्टी का खराब होना और बायोडायवर्सिटी का नुकसान, अब सालाना $1.3 ट्रिलियन के स्तर पर पहुंच गया है।
सब्सिडी का गणित और फिस्कल प्रेशर
मौजूदा सरकारी नीतियां सस्टेनेबल गोल्स के साथ टकरा रही हैं। 2026-27 के यूनियन बजट में फर्टिलाइजर सब्सिडी के लिए ₹1.71 लाख करोड़ का भारी-भरकम आवंटन किया गया है। यह सब्सिडी नाइट्रोजन और पानी की अधिक खपत वाली खेती को बढ़ावा देती है, जिससे पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को अपनाने की गति धीमी हो गई है। PM-PRANAM जैसी योजनाएं फाइलों और नौकरशाही की देरी का शिकार हो रही हैं, जिससे फंड का सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
कार्बन मार्केट की नाकामी
किसानों के लिए कार्बन क्रेडिट्स (Carbon Credits) को एक प्रोत्साहन के तौर पर पेश तो किया जा रहा है, लेकिन छोटे किसानों के लिए यह पहुंच से बाहर है। पंजाब और हरियाणा में देखा गया है कि सत्यापन (Verification) की लंबी प्रक्रिया के कारण किसानों को तुरंत कैश नहीं मिलता, जो उनकी आय के लिए एक बाधा बन गई है। ICRIER और ICAR की रिसर्च बताती है कि मौजूदा स्ट्रक्चर में कार्बन क्रेडिट से होने वाली कमाई एक आम किसान की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए नाकाफी है।
डायरेक्ट इंसेंटिव्स की जरूरत
एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब समय पर-टन वेरिफिकेशन मॉडल से आगे बढ़ने का है। आंध्र प्रदेश के 'कम्युनिटी-मैनेज्ड नेचुरल फार्मिंग' मॉडल ने साबित किया है कि अगर किसानों को सीधे प्रति-हेक्टेयर (Per-hectare) लाभ और इनपुट कॉस्ट में कमी का सीधा फायदा मिले, तो वे सस्टेनेबल तरीके अपनाने में हिचकिचाते नहीं हैं। आने वाले समय में निवेशक इस बात पर नजर रखेंगे कि क्या सरकार सब्सिडी आधारित खर्च से हटकर डायरेक्ट पेमेंट सिस्टम की ओर कदम बढ़ाती है या नहीं।
