भारत में AI को लेकर चल रही तेजी एक बड़ी चुनौती खड़ी कर रही है। जानकारों का कहना है कि अगर समय रहते संरचनात्मक भेदभाव को नहीं सुधारा गया, तो वर्कफोर्स में जेंडर असमानता और गहरी हो सकती है, जिसका असर महिलाओं के करियर और कॉर्पोरेट डाइवर्सिटी गोल्स पर पड़ेगा।
भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की रफ्तार तो तेज है, लेकिन यह विकास अपने साथ जेंडर गैप को लेकर चिंताएं भी ला रहा है। फिलहाल स्थिति यह है कि महिलाएं डेटा एनोटेशन जैसे कम वेतन वाले कामों में ज्यादा हैं, जबकि AI डेवलपमेंट और टेक्निकल लीडरशिप जैसे हाई-ग्रोथ रोल्स में अभी भी पुरुषों का दबदबा कायम है।
आर्थिक और सामाजिक जोखिम
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (World Economic Forum) के 2026 ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स के अनुसार, भारत 131वें स्थान पर है। हैरानी की बात यह है कि STEM फील्ड में ग्रेजुएशन करने वाली महिलाओं की संख्या 43% होने के बावजूद, उन्हें हाई-पेइंग इंडस्ट्री रोल्स नहीं मिल पा रहे हैं। इसकी मुख्य जड़ 'टाइम पॉवर्टी' (Time Poverty) है, क्योंकि घरेलू जिम्मेदारियों के कारण महिलाएं नई स्किल्स सीखने के लिए समय नहीं निकाल पातीं।
कॉर्पोरेट गवर्नेंस में एल्गोरिदम का बायस
निवेशकों के लिए यह एक बड़ा अलार्म है। रिसर्च बताती है कि 44% AI सिस्टम जेंडर बायस के शिकार हैं। अगर कंपनियां अपनी भर्ती और परफॉर्मेंस मैनेजमेंट के लिए ऐसे ही बायस्ड AI टूल्स का इस्तेमाल करती हैं, तो यह सीधे तौर पर महिलाओं के अवसरों को प्रभावित करेगा।
BRSR की बढ़ती सख्ती
अब संस्थागत निवेशकों की नजर इस पर है कि कंपनियां अपने Business Responsibility and Sustainability Reports (BRSR) में AI गवर्नेंस को कैसे दिखाती हैं। भविष्य में उन्हीं कंपनियों का प्रदर्शन बेहतर माना जाएगा, जो न केवल विविधता के आंकड़े पेश करेंगी, बल्कि अपने AI एडॉप्शन में जेंडर-डिसएग्रीगेटेड (Gender-disaggregated) डेटा का प्रभाव भी दिखाएंगी। भारत में लिस्टेड कंपनियों में महिलाओं की भागीदारी अभी भी 18% के आसपास स्थिर है, जिसे सुधारने के लिए Ethical AI Governance की सख्त जरूरत है।
