भारत ने जून तिमाही में **7.8%** की जीडीपी (GDP) ग्रोथ दर्ज की है, लेकिन सरकारी आंकड़ों की नई मेथोडोलॉजी पर अर्थशास्त्रियों ने सवाल उठा दिए हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था ने जून तिमाही में 7.8% की ग्रोथ दिखाई है, लेकिन यह आंकड़ा फिलहाल नीति निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों के बीच बहस का विषय बन गया है। सरकार ने जीडीपी के बेस ईयर को बदलकर 2022-23 कर दिया है और नए प्राइस इंडेक्स को शामिल किया है, जो इस पूरे विवाद की जड़ है।
सरकार का क्या है तर्क?
सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI) का दावा है कि ये बदलाव अर्थव्यवस्था की सटीक तस्वीर दिखाने के लिए किए गए हैं। मंत्रालय के मुताबिक, 'डबल-डिफ्लेशन' तकनीक और नए प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) के इस्तेमाल से डेटा अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के और करीब है। इसी दौरान नॉमिनल जीडीपी 10.3% और रियल ग्रॉस वैल्यू एडेड (GVA) ग्रोथ 8.2% दर्ज की गई है।
क्यों हो रही है आलोचना?
पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग जैसे कई दिग्गजों ने इस 7.8% के आंकड़े पर संदेह जताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जीडीपी डिफ्लेटर का 2.3% पर रहना चिंताजनक है, क्योंकि यह रिटेल और होलसेल महंगाई दर से काफी कम है। आशंका है कि इससे रियल ग्रोथ का आंकड़ा बढ़ा-चढ़ाकर दिख रहा है।
बाजार पर असर
यह सांख्यिकीय बहस ऐसे समय में हो रही है जब बाजार में मिले-जुले संकेत हैं। एक तरफ बैंक क्रेडिट ग्रोथ दशक के उच्चतम स्तर पर है और टैक्स रेवेन्यू मजबूत है, तो दूसरी तरफ परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) कमजोरी दिखा रहा है। इस अंतर के कारण शेयर बाजार में निवेशकों का मूड फिलहाल सतर्क है। आने वाले समय में बाजार अब केवल हेडलाइन जीडीपी के बजाय कंज्यूमर डिमांड, रोजगार के आंकड़े और कॉर्पोरेट अर्निंग्स पर ज्यादा नजर रखेगा।
