भारत की **7.8%** की जीडीपी ग्रोथ पर एक नई बहस शुरू हो गई है। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इसके कैलकुलेशन पर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि यह नया बेस ईयर (**2022-23**) और पुराने डेटा (**2011-12**) के बीच तालमेल बिठाने की प्रक्रिया है।
देश के आर्थिक विकास के आंकड़ों को लेकर पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के बयानों ने चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है। विवाद का केंद्र वित्त वर्ष 2026-27 की अप्रैल-जून तिमाही की 7.8% की रियल जीडीपी ग्रोथ है।\n\nगर्ग का मानना है कि नॉमिनल जीडीपी बेस में बड़े संशोधनों के कारण हेडलाइन ग्रोथ का आंकड़ा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा सकता है। उन्होंने पिछले वित्त वर्ष के नॉमिनल डेटा में भारी कटौती की ओर इशारा करते हुए आंकड़ों की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं और स्पष्टीकरण की मांग की है।\n\n### सरकार का क्या है कहना?\n\nसांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने इन चिंताओं को तकनीकी गलतफहमी करार दिया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि फरवरी 2026 में भारत ने जीडीपी सीरीज का बेस ईयर बदलकर 2022-23 कर दिया है। अधिकारियों ने इसे 'सेब और संतरे की तुलना' (apples and oranges comparison) बताते हुए कहा कि नए डेटा की तुलना पुराने 2011-12 के सीरीज से करना गणितीय रूप से गलत है।\n\n### निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?\n\nनिवेशकों के लिए इन बदलावों को समझना बेहद अहम है क्योंकि जीडीपी डेटा का सीधा असर Reserve Bank of India (RBI) की ब्याज दरों से जुड़े फैसलों पर पड़ता है। नई सीरीज में Producer Price Index (PPI) जैसे बेहतर इंडेक्स शामिल किए गए हैं, जो भले ही शुरुआती समय में उलझन पैदा कर रहे हों, लेकिन सरकार का दावा है कि ये अर्थव्यवस्था की हकीकत को ज्यादा सटीक तरीके से पेश करेंगे। फिलहाल बाजार के खिलाड़ी भविष्य के मैक्रो-इकोनॉमिक डेटा पर नजर टिकाए हुए हैं ताकि उपभोग और मैन्युफैक्चरिंग के ट्रेंड्स की सही तस्वीर साफ हो सके।
