भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाली **7.3 करोड़** से ज्यादा नैनो-एंटरप्राइजेज (जिनका सालाना टर्नओवर **₹1 करोड़** से कम है) को फॉर्मल बैंकिंग से लोन लेने में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पारंपरिक कोलेटरल-आधारित मॉडल के फेल होने के बाद, अब कैश-फ्लो आधारित लेंडिंग को एक बड़े समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
भारतीय अर्थव्यवस्था की नींव रखने वाली ये नैनो-एंटरप्राइजेज स्थानीय रोजगार और सेवाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। आंकड़ों के अनुसार, देश में ऐसी लगभग 7.38 करोड़ इकाइयां हैं, लेकिन अफसोस की बात है कि ये आज भी औपचारिक बैंकिंग सिस्टम से बाहर हैं।
फाइनेंशियल मॉडल का मिसमैच
समस्या यह है कि पारंपरिक बैंक और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस लोन देते समय ऑडिटेड फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स और फिजिकल कोलेटरल मांगते हैं। अधिकांश नैनो-एंटरप्राइजेज 'न्यू-टू-क्रेडिट' (New-to-Credit) श्रेणी में आते हैं और उनके पास कागजी दस्तावेज कम होते हैं। नतीजतन, बैंक इनके बिजनेस मॉडल को जोखिम भरा मानकर लोन देने से कतराते हैं। बाजार में दो तरह की इकाइयां हैं: 'ओन अकाउंट' जो केवल परिवार पर निर्भर हैं, और 'हायर वर्कर' जो अतिरिक्त स्टाफ रखती हैं। दोनों के लिए 'वन-साइज-फिट्स-ऑल' अप्रोच पूरी तरह विफल साबित हो रही है।
कैश-फ्लो लेंडिंग की ओर कदम
अब लेंडर्स अपना नजरिया बदल रहे हैं। बैलेंस शीट के बजाय, अब 'डिजिटल पेमेंट रिकॉर्ड्स', 'यूटिलिटी बिल्स' और 'सप्लाई चेन एक्टिविटी' जैसे डेटा का उपयोग करके बिजनेस की असल कमाई का आकलन किया जा रहा है।
पॉलिसी के स्तर पर भी चर्चा तेज है कि क्या 'प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग' (PSL) के तहत इन नैनो-एंटरप्राइजेज के लिए कोई अलग कोटा तय किया जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो बैंकों को छोटे उद्यमियों को फंड देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिससे क्रेडिट गैप काफी हद तक कम हो सकता है। भविष्य में डिजिटल अंडरराइटिंग टूल्स ही इस सेक्टर में लोन के दरवाजे खोलने की चाबी साबित होंगे।
