भारत की विशाल वर्कफोर्स एक गंभीर 'स्किल गैप' से जूझ रही है, जहां सिर्फ **2.3%** वर्कर ही फॉर्मल ट्रेनिंग ले पाते हैं। यह स्थिति कंपनियों पर लागत का बोझ डाल रही है और AI के दौर में 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' को एक बड़ी चुनौती बना रही है।
भारत अपनी 145 करोड़ की आबादी के साथ दुनिया की सबसे बड़ी वर्कफोर्स का घर है, लेकिन एक डिजिटल-फर्स्ट इकोनॉमी बनने की राह में 'स्किल गैप' सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ा है। जहां एक तरफ 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' की चर्चा होती है, वहीं हकीकत यह है कि भारत में केवल 2.3% वर्कफोर्स को ही फॉर्मल वोकेशनल ट्रेनिंग मिलती है। तुलना करें तो जर्मनी में यह आंकड़ा 75% और यूके में 68% है।
कंपनियों पर 'हिडन टैक्स' का बोझ
स्किल की इस कमी का सीधा असर कंपनियों के ऑपरेशनल खर्च पर पड़ रहा है। TCS, Infosys और Wipro जैसी बड़ी IT कंपनियां आज मजबूर हैं कि वे फ्रेशर्स को हायर करने के बाद उन पर भारी भरकम ट्रेनिंग खर्च करें। SHRM इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 45% कंपनियां मानती हैं कि AI और डेटा स्किल्स की कमी उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है। यह खर्च सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि कंपनियों की इनोवेशन पावर को कम करने वाला एक 'हिडन टैक्स' है।
आर्थिक जोखिम और GCC सेक्टर पर संकट
NITI Aayog की रिपोर्ट के अनुसार, देश के करीब 8.7 करोड़ युवा 'NEET' (नॉट इन एजुकेशन, एंप्लॉयमेंट और ट्रेनिंग) कैटेगरी में आते हैं। अगर इन्हें मुख्यधारा में नहीं लाया गया, तो यह डेमोग्राफिक डिविडेंड एक आर्थिक बोझ बन सकता है। यहाँ तक कि भारत के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) सेक्टर को 2030 तक 19.3% के वैल्यू लॉस का सामना करना पड़ सकता है, यदि टैलेंट की कमी बनी रही।
सरकार की नई रणनीति: आउटकम-लिंक्ड फाइनेंसिंग
सरकार अब इस समस्या को सुलझाने के लिए कमर कस चुकी है। यूनियन बजट FY 2025-26 में स्किलिंग के लिए ₹34,000 करोड़ का बड़ा फंड आवंटित किया गया है। अब सरकार 'एनरोलमेंट' के बजाय 'आउटकम-लिंक्ड' फाइनेंसिंग पर जोर दे रही है, यानी ट्रेनिंग का मतलब सिर्फ सर्टिफिकेट नहीं, बल्कि पक्की नौकरी होनी चाहिए। निवेशकों के लिए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप कितनी जल्दी वर्कफोर्स की प्रोडक्टिविटी बढ़ा पाती है।
