30 साल से कम उम्र के ट्रेडर्स अब भारत में F&O सेगमेंट में 43% की हिस्सेदारी रखते हैं। ये युवा निवेशक भले ही मार्केट में भारी वॉल्यूम ला रहे हों, लेकिन SEBI की FY26 की रिपोर्ट बताती है कि इनमें से 89% को भारी नुकसान हुआ है, जिसका मुख्य कारण हाई-रिस्क वाले ऑप्शंस ट्रेडिंग को माना जा रहा है।
F&O में किसका दबदबा?
भारत के रिटेल डेरिवेटिव्स मार्केट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां युवा निवेशक अब इस सेगमेंट को लीड कर रहे हैं। 2026 फाइनेंशियल ईयर के आंकड़ों के मुताबिक, 40 साल से कम उम्र के लोग फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) सेगमेंट में 78% रिटेल पार्टिसिपेंट्स हैं। इस ग्रुप में, 30 साल से कम उम्र वाले अकेले 43% का आंकड़ा रखते हैं, जो 2022 के 31% से काफी ज्यादा है।
वॉल्यूम बढ़ा, पर जोखिम भी
जहां एक तरफ इन नए निवेशकों के आने से ट्रेडिंग वॉल्यूम में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, वहीं दूसरी तरफ इस उम्र के ऐसे लोगों के लिए फाइनेंशियल रिस्क भी बढ़ा है, जिनके पास अक्सर ज्यादा सेविंग्स (Equity Buffer) नहीं होती। सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) की स्टडी बताती है कि 30 साल से कम उम्र के लगभग 89% ट्रेडर्स को इस साल नेट फाइनेंशियल लॉस हुआ है। यह नुकसान सिर्फ सबसे युवा ट्रेडर्स तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सभी रिटेल निवेशकों ने कुल मिलाकर FY26 में ₹91,685 करोड़ का नेट लॉस सहा है।
नुकसान की मुख्य वजहें
इन भारी नुकसानों के पीछे एक बड़ी वजह ट्रेडिंग की इंटेंसिटी है, जो उनके अकाउंट साइज के मुकाबले बहुत ज्यादा है। कई पार्टिसिपेंट्स, जिनमें 73% की सालाना इनकम ₹5 लाख से कम है, हाई टर्नओवर रेश्यो दिखाते हैं। ये ट्रेडर्स अक्सर किसी बड़े लॉन्ग-टर्म इक्विटी होल्डिंग के बिना डेरिवेटिव्स मार्केट में उतरते हैं और अपनी पोर्टफोलियो वैल्यू से 75 गुना तक ज्यादा लीवरेज का इस्तेमाल करके ट्रेडिंग करते हैं। यह तरीका उन्हें मार्केट की वोलेटिलिटी के प्रति बहुत ज्यादा असुरक्षित बनाता है, खासकर ऑप्शंस ट्रेडिंग में, जिसने फाइनेंशियल ईयर में सभी रिटेल नुकसानों का 92% हिस्सा बनाया।
मार्केट की मुश्किल हकीकत
इंडिविजुअल निवेशकों के लिए मार्केट का माहौल काफी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है, क्योंकि वे अक्सर बड़े इंस्टीट्यूशनल और एल्गोरिथम ट्रेडर्स से मुकाबला करते हैं, जिनके पास बेहतर डेटा और कैपिटल रिसोर्सेज होते हैं। F&O ट्रेडर्स की कुल संख्या में कमी के बावजूद, प्रति इंडिविजुअल ट्रेडर का औसत नुकसान FY26 में बढ़कर ₹1.17 लाख हो गया, जो FY25 में ₹1.14 लाख था। इससे पता चलता है कि जहां रिटेल सेगमेंट में कुल नुकसान थोड़ा कम हुआ, वहीं जो ट्रेडर मार्केट में सक्रिय रहे, उन्हें और भी बड़े फाइनेंशियल झटके लगे।
आगे क्या?
यह ट्रेंड निवेशकों के लिए डेरिवेटिव्स में हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग से जुड़े सिस्टमैटिक रिस्क को उजागर करता है। मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए F&O को एंट्री पॉइंट के तौर पर इस्तेमाल करना, बजाय एक स्टेबल इक्विटी फाउंडेशन बनाने के, अक्सर कैपिटल इरोज़न का कारण बनता है। रिटेल सेगमेंट के लिए सबसे अहम मॉनिटर करने वाली बात ऐसी हाई-रिस्क स्ट्रैटेजी की सस्टेनेबिलिटी है, खासकर जब करंट मार्केट स्ट्रक्चर में इंडिविजुअल ट्रेडर्स के लिए नेट लॉस की हाई प्रोबेबिलिटी का स्पष्ट डेटा मौजूद है।
