अमेरिकी संस्थानों में भारतीय छात्रों की संख्या 29 महीने के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। जुलाई 2026 तक, यह संख्या **12%** घटकर **3,38,230** रह गई है। वीज़ा नियमों में सख्ती और अप्रूवल में आई भारी गिरावट के कारण छात्र अब दूसरे देशों का रुख कर रहे हैं, जिससे अमेरिकी विश्वविद्यालयों के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
वीज़ा नीतियों का असर
अमेरिकी उच्च शिक्षा संस्थानों में भारतीय छात्रों के नामांकन में आई यह कमी लगातार 10 महीनों से जारी है। सितंबर 2025 से जुलाई 2026 के बीच छात्रों की संख्या में 12% की गिरावट देखी गई है। इस गिरावट का मुख्य कारण वीज़ा प्रक्रिया में हो रही देरी और सख्त होते आव्रजन नियम हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2025 के एडमिशन सीजन के दौरान भारतीय नागरिकों के लिए F-1 छात्र वीज़ा अप्रूवल में 62% की भारी कमी आई है।
इसके अलावा, 15 सितंबर, 2026 से लागू होने वाले नए अमेरिकी आव्रजन नियम छात्रों के लिए मुश्किलें और बढ़ाएंगे। इस नियम के तहत, छात्र वीज़ा पर निश्चित समय-सीमा तय की जाएगी, और यदि अकादमिक कार्यक्रम चार साल से अधिक का है तो छात्रों को एक्सटेंशन के लिए आवेदन करना होगा। इस बढ़ी हुई जटिलता के कारण कई छात्र अपनी 'स्टडी-अब्रोड' (Study Abroad) योजनाओं पर पुनर्विचार कर रहे हैं।
यह गिरावट खासकर मास्टर डिग्री (Master's Degree) करने वाले छात्रों में सबसे ज़्यादा देखी जा रही है, जो अमेरिका में भारतीय विद्वानों का सबसे बड़ा समूह हैं। इस वर्ग में नामांकन में 11.3% की साल-दर-साल (Year-on-Year) कमी आई है। हालांकि अमेरिका STEM रिसर्च (STEM-focused research) के लिए एक प्रमुख गंतव्य बना हुआ है, लेकिन घटती संख्या यह दर्शाती है कि छात्र अब ट्यूशन फीस, वीज़ा की विश्वसनीयता और पढ़ाई के बाद के रोज़गार के अवसरों जैसे कारकों को ध्यान में रखते हुए 'रिटर्न-ऑन-इंवेस्टमेंट' (Return-on-Investment) की गणना पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं।
विश्वविद्यालयों पर आर्थिक प्रभाव
अमेरिकी विश्वविद्यालयों के लिए यह रुझान एक वित्तीय जोखिम प्रस्तुत करता है। जिन संस्थानों की आय का 10% से अधिक हिस्सा अंतर्राष्ट्रीय छात्रों की ट्यूशन फीस से आता है, वे संभावित बजट घाटे का सामना कर रहे हैं। 'एसोसिएशन ऑफ इंटरनेशनल एजुकेटर्स' (Association of International Educators) और अन्य उद्योग विश्लेषकों के अनुमानों के अनुसार, फॉल 2026 के इंटेक के लिए कुल अंतर्राष्ट्रीय छात्र नामांकन में लगभग 9.5% की गिरावट आ सकती है। इस गिरावट से आर्थिक गतिविधियों में लगभग $3.4 बिलियन का नुकसान और अमेरिकी विश्वविद्यालय पारिस्थितिकी तंत्र में हज़ारों नौकरियों के जाने का अनुमान है।
जैसे-जैसे अमेरिका कम सुलभ होता जा रहा है, यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom), जर्मनी (Germany) और फ्रांस (France) जैसे देश अधिक व्यवहार्य विकल्प के रूप में खुद को स्थापित कर रहे हैं। छात्र किसी एक स्थान पर अस्वीकृति या लंबे इंतजार के जोखिम को कम करने के लिए मल्टी-कंट्री (Multi-country) आवेदन रणनीति की ओर बढ़ रहे हैं। भारतीय शिक्षा सलाहकारों और एड-टेक (Ed-tech) कंपनियों के लिए, यह एक व्यावसायिक फोकस में बदलाव का संकेत देता है, क्योंकि उन्हें अब केवल अमेरिकी मार्ग पर निर्भर रहने के बजाय इन विविध वैश्विक बाजारों में छात्रों की मदद करने के लिए अपनी सलाहकार सेवाओं को अनुकूलित करना होगा।
निवेशकों और हितधारकों को आगामी फॉल 2026 नामांकन डेटा पर नज़र रखनी चाहिए, जो यह स्पष्ट तस्वीर देगा कि क्या ये आव्रजन नीतियां वैश्विक शिक्षा क्षेत्र में दीर्घकालिक संरचनात्मक परिवर्तन लाएंगी। सितंबर 2026 के नए वीज़ा नियमों का प्रभाव भविष्य के छात्र प्रवाह और विश्वविद्यालय राजस्व स्थिरता को निर्धारित करने में भी एक प्रमुख कारक होगा।
