वित्तीय वर्ष 2026 में भारतीय शेयर बाज़ार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। घरेलू निवेशकों ने विदेशी बिकवाली के बीच बाज़ार को सहारा देने में अहम भूमिका निभाई है। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) के ₹2.4 लाख करोड़ से ज़्यादा के आउटफ्लो को घरेलू खरीदारों ने सोख लिया है। रिकॉर्ड SIPs के ज़रिए लगातार आ रहे रिटेल निवेश ने वैश्विक पूंजी पर निर्भरता कम कर दी है, हालांकि बाज़ार के वैल्यूएशन और भू-राजनीतिक तनाव जैसी चिंताएं बनी हुई हैं।
घरेलू निवेशकों का बढ़ा दबदबा
वित्तीय वर्ष 2026 में भारतीय इक्विटी बाज़ार ने एक महत्वपूर्ण परिवर्तन देखा है। विदेशी पूंजी का पारंपरिक दबदबा कम हुआ है और अब यह बाज़ार ज़्यादा घरेलू निवेश पर आधारित हो गया है। इस पूरे साल, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने लगातार बिकवाली की है, और अगस्त 2026 के मध्य तक भारतीय इक्विटी से ₹2.4 लाख करोड़ से अधिक की निकासी कर चुके हैं। इस आक्रामक बिकवाली के बावजूद, बाज़ार ने लचीलापन दिखाया है, जिसका मुख्य श्रेय घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) की लगातार खरीदारी को जाता है।
DIIs बने बाज़ार के 'शॉक एब्जॉर्बर'
आंकड़े बताते हैं कि DIIs ने FY26 में लगभग ₹8.09 लाख करोड़ की इक्विटी खरीदी है। इस तरह उन्होंने विदेशी बिकवाली के असर को काफी हद तक कम कर दिया है। यह रुझान इस बात को दर्शाता है कि भारतीय बाज़ार वैश्विक लिक्विडिटी में बदलावों पर कैसे प्रतिक्रिया कर रहा है। इस स्थिरीकरण में म्यूचुअल फंड उद्योग ने बड़ी भूमिका निभाई है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर फ्री-फ्लोट मार्केट कैपिटलाइज़ेशन में म्यूचुअल फंड की हिस्सेदारी मार्च 2026 तक लगभग 23% तक पहुँच गई, जो पांच साल पहले केवल 15% के आसपास थी।
SIPs से रिटेल निवेश में तेज़ी
इस घरेलू समर्थन का मुख्य कारण सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIPs) के ज़रिए पूंजी का लगातार प्रवाह है। रिटेल निवेशकों की भागीदारी में ज़बरदस्त उछाल आया है, फरवरी 2026 में मासिक SIP योगदान ₹32,087 करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया। यह नियमित निवेश बाज़ार को लिक्विड बनाए रखने में मदद करता है, खासकर तब जब विदेशी बिकवाली तेज़ हो। बचत का वित्तीयकरण (Financialization of savings) अब सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, टियर-2 और टियर-3 क्षेत्रों की भागीदारी भी लगातार बढ़ रही है, जिससे बाज़ार और गहरा हो रहा है।
बाज़ार के सामने चुनौतियां
हालांकि, बाज़ार चुनौतियों से अछूता नहीं है। घरेलू लिक्विडिटी ने एक आधार प्रदान किया है, लेकिन सूचकांकों (Indices) में अस्थिरता देखी गई है। वैश्विक फंड मैनेजरों ने भारतीय बाज़ार के वैल्यूएशन को लेकर चिंताएं जताई हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सेक्टर में अन्य वैश्विक बाज़ारों की तुलना में भारत की हिस्सेदारी कम है। इसके अलावा, भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण 2026 की शुरुआत में 'रिस्क-ऑफ' (risk-off) का माहौल बना। लगातार विदेशी बिकवाली भारतीय रुपये पर भी दबाव डाल रही है, जिससे समग्र लिक्विडिटी की स्थिति प्रभावित हो रही है।
SEBI के सुधार और आगे की राह
SEBI जैसे नियामक निकाय इन दबावों को दूर करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। बाज़ार की गहराई (market depth) को बेहतर बनाने के लिए सुधारों की योजनाएं चल रही हैं, जैसे कि कोलेटरल आवश्यकताओं को कम करना और भारतीय बाज़ार को अधिक प्रतिस्पर्धी और स्थिर बनाने के लिए लंबी अवधि के डेरिवेटिव्स (derivatives) को प्रोत्साहित करना। निवेशकों को आने वाली तिमाहियों में इन घरेलू प्रवाहों के स्थायित्व पर नज़र रखनी चाहिए, खासकर अगर वैश्विक अस्थिरता बनी रहती है। बाज़ार की गति बनाए रखने की क्षमता, रिटेल भागीदारी, कॉरपोरेट आय वृद्धि और वैश्विक ब्याज दरों के स्थिर होने पर निर्भर करेगी।
