ग्लोबल मार्केट से मिले खराब संकेतों के कारण भारतीय बाजार दबाव में है। ब्रेंट क्रूड ऑयल का भाव **$110** प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड्स कई सालों के उच्चतम स्तर पर हैं, जिससे बाजार में **12%** की गिरावट आई है।
भारतीय शेयर बाजार इस समय एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों का $110 के स्तर के करीब पहुंचना और अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड का 17-साल के उच्च स्तर पर पहुंचना घरेलू निवेशकों के लिए बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। इन अंतरराष्ट्रीय कारणों ने मार्केट में भारी उतार-चढ़ाव पैदा कर दिया है।
कॉरपोरेट मुनाफे पर असर
बढ़ते कच्चे तेल के दाम सीधे तौर पर कंपनियों के मार्जिन को प्रभावित कर रहे हैं। पेंट, केमिकल और टायर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में इनपुट कॉस्ट बढ़ गई है। वहीं, एविएशन सेक्टर, जिसमें IndiGo जैसी कंपनियां शामिल हैं, वे भी फ्यूल के बढ़ते खर्चों से जूझ रही हैं। बड़ी चुनौती यह है कि क्या ये कंपनियां लागत बढ़ने का बोझ खुद उठाएंगी या ग्राहकों पर डालेंगी, जिससे महंगाई और बढ़ सकती है।
RBI और मैक्रो फैक्टर्स
रुपये की कमजोरी और डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचना देश के ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) को बढ़ा रहा है। इस स्थिति ने Reserve Bank of India के सामने दुविधा पैदा कर दी है, क्योंकि महंगाई पर लगाम कसने के लिए ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश कम दिख रही है।
FIIs का रुख और बाजार की चाल
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने इस साल अब तक भारतीय बाजारों से लगभग ₹2.45 लाख करोड़ की भारी-भरकम निकासी की है। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने बाजार को संभालने की पूरी कोशिश की है, वरना गिरावट और गहरी हो सकती थी।
सितंबर के उच्चतम स्तर से 12% की गिरावट के बाद कई लार्ज-कैप और मिड-कैप स्टॉक्स के वैल्युएशन अब आकर्षक दिख रहे हैं। हालांकि, बाजार की आगे की दिशा पूरी तरह से वैश्विक बॉन्ड यील्ड्स और क्रूड की कीमतों में स्थिरता पर निर्भर करेगी। निवेशकों के लिए सलाह है कि वे उन कंपनियों पर नजर रखें जो हाई-कॉस्ट माहौल में भी अपने मार्जिन को बरकरार रखने में सक्षम हैं।
