भारतीय स्टील सेक्टर अब पूरी तरह से स्थानीय मांग पर फोकस कर रहा है। अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच स्टील की खपत **7.9%** बढ़कर **56 मिलियन टन** पहुंच गई है, जो वैश्विक चुनौतियों के बावजूद सेक्टर की मजबूती को दर्शाता है।
घरेलू मांग से मिली मजबूती
अमेरिका की ट्रेड बाधाओं और 'Section 232' के टैरिफ का भारतीय स्टील कंपनियों पर खास असर नहीं पड़ रहा है। भारत का स्टील सेक्टर लंबे समय से अपने कामकाज को घरेलू जरूरतों के हिसाब से ढाल चुका है। डेटा के मुताबिक, भारत में स्टील का प्रति व्यक्ति उपभोग अभी 107 किलो है, जबकि वैश्विक औसत 220 किलो से अधिक है, जो भविष्य में विकास की अपार संभावनाएं दिखाता है।
सरकार की 'नेशनल स्टील पॉलिसी 2017' के तहत इस दशक के अंत तक 300 मिलियन टन उत्पादन क्षमता का लक्ष्य रखा गया है। बुनियादी ढांचे (Infrastructure) में हो रहे विस्तार के चलते ही देश में फिनिश्ड स्टील की खपत में 7.9% की बढ़त दर्ज की गई है।
ग्रीन टेक्नोलॉजी और चुनौतियां
यूरोपीय संघ के 'CBAM' (Carbon Border Adjustment Mechanism) जैसे सख्त मानकों को देखते हुए भारतीय कंपनियां अब 'कोल गैसीफिकेशन' (Coal Gasification) पर तेजी से काम कर रही हैं। यह तकनीक न केवल नेचुरल गैस पर निर्भरता कम करती है, बल्कि कार्बन फुटप्रिंट को भी घटाती है।
Jindal Steel इस दिशा में काफी सक्रिय है, जिसके पास अभी 8 मिलियन टन की कोल गैसीफिकेशन क्षमता है। पूरे देश में फिलहाल 22.6 मिलियन टन की क्षमता चालू है या आने वाले समय में शुरू होने वाली है।
निवेशकों के लिए राय
निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि ग्रीन एनर्जी और नई तकनीक के अपनाने में भारी खर्च होता है, जिसका असर शॉर्ट-टर्म कैश फ्लो पर दिख सकता है। पोर्टफोलियो में स्टील शेयरों को रखने से पहले इंफ्रास्ट्रक्चर स्पेंडिंग और रॉ मैटेरियल की कीमतों पर बारीकी से नजर रखना जरूरी होगा।
