भारत के कई राज्य ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) को आकर्षित करने के लिए नई नीतियां ला रहे हैं। लक्ष्य 2031 तक 11 लाख नई नौकरियां और 1,300 से ज़्यादा सेंटर स्थापित करना है। इस दौड़ की वजह से कमर्शियल रियल एस्टेट की मांग बढ़ रही है, और GCCs अब ऑफिस लीजिंग का 40% से ज़्यादा हिस्सा बन चुके हैं।
ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) के लिए राज्यों में होड़
भारत के अलग-अलग राज्य ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) को अपने यहां बुलाने के लिए ज़ोर-शोर से जुटे हुए हैं। ये सेंटर मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए स्ट्रेटेजिक हब का काम करते हैं, जहां टेक्नोलॉजी, रिसर्च, फाइनेंस और इंजीनियरिंग जैसे काम होते हैं। पूरे देश का लक्ष्य 2031 तक 1,300 से ज़्यादा नए GCCs स्थापित करना और 11 लाख से ज़्यादा नौकरियां पैदा करना है।
निवेश के लिए पॉलिसी की जंग
इन बड़े ग्राहकों को लुभाने के लिए, राज्य सरकारें सिर्फ पारंपरिक तरीके नहीं अपना रहीं। कर्नाटक, महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने GCCs के लिए खास नीतियां (Policies) शुरू की हैं। तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे अन्य राज्य भी विशेष छूट और आसान अप्रूवल (Approvals) के लिए ढांचा तैयार कर रहे हैं। यह होड़ इसलिए है ताकि बाहर या देश के दूसरे हिस्सों के मुकाबले सबसे अच्छा बिजनेस माहौल बनाया जा सके।
कमर्शियल रियल एस्टेट पर असर
इस नीतिगत पहल का सीधा असर कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर पर दिख रहा है। GCCs अब सिर्फ कभी-कभी आने वाले किरायेदार नहीं हैं, बल्कि ऑफिस स्पेस की मांग के मुख्य जरिया बन गए हैं। 2022 से 2026 की पहली छमाही तक, GCCs ने भारत के नौ बड़े शहरों में 123 मिलियन स्क्वायर फीट से ज़्यादा ऑफिस स्पेस लीज़ पर लिया है। कुल ऑफिस लीजिंग में इनकी हिस्सेदारी 2022 में 29% से बढ़कर 2026 की पहली छमाही में 43% हो गई है।
बेंगलुरु इस मामले में सबसे आगे है, जिसने राष्ट्रीय लीजिंग वॉल्यूम का लगभग 42% हिस्सा कवर किया है, यानी 51 मिलियन स्क्वायर फीट से ज़्यादा लीज़ पर लिया है। हैदराबाद दूसरा सबसे बड़ा हब है, जो करीब 20% लीजिंग गतिविधि में योगदान देता है। चेन्नई, दिल्ली-NCR और पुणे जैसे प्रमुख बाज़ार भी अच्छी मांग देख रहे हैं, जबकि मुंबई खास तौर पर बैंकिंग और फाइनेंसियल सर्विसेज ग्राहकों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।
जोखिम और ध्यान देने योग्य बातें
हालांकि यह ग्रोथ ट्रेंड मजबूत है, लेकिन इसमें कुछ खास जोखिम भी हैं जिन्हें निवेशकों को समझना चाहिए। सबसे बड़ा कंसर्न 'इंसेटिव वॉर' (Incentive War) है। जैसे-जैसे राज्य प्रतिस्पर्धा करते हैं, वे भारी टैक्स छूट या सब्सिडी दे सकते हैं, जो अगर ठीक से मैनेज न हो तो उनकी फिस्कल हेल्थ (Fiscal Health) को नुकसान पहुंचा सकती है।
इसके अलावा, कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर अब काफी हद तक इन GCCs की सेहत पर निर्भर है। अगर ग्लोबल इकोनॉमिक कंडीशन (Global Economic Conditions) टाइट होती हैं या मल्टीनेशनल कंपनियां अपने आईटी और इनोवेशन बजट कम करती हैं, तो हाई-एंड ऑफिस स्पेस की मांग धीमी हो सकती है, जिससे वैकेंसी लेवल (Vacancy Levels) बढ़ सकते हैं।
निवेशकों के लिए, सिर्फ नौकरियों के आंकड़ों पर ही नहीं, बल्कि इन नीतियों की स्थिरता और भारत-आधारित ऑपरेशनल हब की ग्लोबल मांग पर भी नज़र रखनी होगी। साथ ही, यह भी देखना होगा कि कमर्शियल डेवलपर्स अपने ऑफिस पोर्टफोलियो को कैसे मैनेज करते हैं और क्या कुछ बाज़ारों में बढ़ती सप्लाई रेंटल यील्ड (Rental Yields) पर दबाव बनाती है।
