वित्तीय वर्ष 2026 में 17 प्रमुख भारतीय राज्यों का फिस्कल डेफिसिट (राजकोषीय घाटा) उनके आर्थिक उत्पादन का **3.2%** रहा। इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढांचा) पर खर्च बजट के लक्ष्यों से पीछे रह गया। वहीं, राज्यों का कुल कर्ज बढ़कर **29.2%** हो गया है, जो कि अनुशंसित **20%** की सीमा से काफी ऊपर है। ऐसे में लॉन्ग-टर्म निवेश में आई यह सुस्ती क्षेत्रीय आर्थिक विकास के लिए एक चुनौती पेश करती है।
राज्यों की वित्तीय सेहत पर क्या है रिपोर्ट?
वित्तीय वर्ष 2026 में 17 प्रमुख भारतीय राज्यों की वित्तीय सेहत मिली-जुली तस्वीर पेश कर रही है। इन राज्यों का सामूहिक फिस्कल डेफिसिट (राजस्व और खर्च के बीच का अंतर) उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का 3.2% पर स्थिर बना हुआ है। हालांकि कुछ राज्यों ने अपने वित्तीय अनुशासन में सुधार किया है, लेकिन समग्र रुझान यह दिखाता है कि राज्यों के बजट पर भारी कर्ज और बुनियादी ढांचे पर उम्मीद से धीमी गति से खर्च के कारण काफी दबाव है।
पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) में गिरावट
पूंजीगत व्यय, यानी सड़क और पुल जैसी लंबी अवधि की संपत्ति बनाने पर किया जाने वाला खर्च, आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण इंजन है। FY26 में, यह खर्च धीमा पड़ गया और GSDP का केवल 2.2% रहा, जो बजट में निर्धारित 2.9% के लक्ष्य से काफी कम है। यह लक्ष्य से चूकना निवेशकों और विश्लेषकों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि बुनियादी ढांचे पर कम खर्च इन क्षेत्रों में भविष्य के विकास के अवसरों को सीमित कर सकता है।
कर्ज का बोझ और राज्यों की स्थिति
वित्तीय तनाव पूरे देश में एक जैसा नहीं है। मजबूत वित्तीय स्वास्थ्य वाले राज्यों और गंभीर दबाव झेल रहे राज्यों के बीच एक बड़ा अंतर देखा जा रहा है। झारखंड ने 1.2% के साथ सबसे कम डेफिसिट दर्ज किया, जबकि बिहार में यह 5.8% रहा। इसके अलावा, मध्य प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल, केरल और राजस्थान जैसे राज्य भारी कर्ज के बोझ से जूझ रहे हैं। इन राज्यों का कुल कर्ज अनुमानित रूप से उनकी अर्थव्यवस्था के आकार का 29.2% तक पहुंच गया है, जो वित्तीय विशेषज्ञों द्वारा आम तौर पर टिकाऊ माने जाने वाले 20% के स्तर से काफी ऊपर है।
राजस्व की चिंताएं
राजस्व सृजन (Revenue Generation) भी एक बढ़ती हुई चिंता का विषय है। पिछले वर्ष 0.7% की तुलना में संयुक्त राजस्व डेफिसिट बढ़कर 0.8% हो गया। इसका मतलब है कि कई राज्य विकास के बजाय रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने के लिए उधार पर अधिक निर्भर हो रहे हैं। बारह राज्यों ने राजस्व डेफिसिट दर्ज किया, जिसमें आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पंजाब, बिहार और तमिलनाडु में सबसे महत्वपूर्ण कमी देखी गई। इसके विपरीत, झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों ने अपने राजस्व खातों को अधिशेष (Surplus) में रखने में कामयाबी हासिल की।
भविष्य की राह
आगे चलकर, 16वें वित्त आयोग द्वारा कुछ अनुदानों को रोकने के फैसले से वित्तीय परिदृश्य में और बदलाव आने की उम्मीद है, जो पहले राजस्व की कमी को पूरा करने के लिए दिए जाते थे। इस बदलाव से राज्यों को अपनी आय बढ़ाने के नए तरीके खोजने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, क्योंकि वे अब केंद्रीय हस्तांतरणों पर निर्भर नहीं रह सकते। निवेशक और नीति निर्माता इस बात पर नजर रखेंगे कि राज्य आगामी तिमाहियों में अपने राजस्व संग्रह में सुधार कर पाते हैं, गैर-जरूरी खर्चों को नियंत्रित कर पाते हैं और बुनियादी ढांचे के निवेश को फिर से गति दे पाते हैं या नहीं।
