भारतीय राज्यों ने अपने कर्ज चुकाने की अवधि को बढ़ा दिया है, जो मार्च 2025 तक औसतन 8.85 साल तक पहुंच गई है। हालांकि इससे फौरी राहत जरूर मिली है, लेकिन कुल **₹62.97 लाख करोड़** के कर्ज का बोझ अभी भी बरकरार है।
भारतीय राज्य सरकारें बढ़ते राजकोषीय दबाव को संभालने के लिए अपनी उधारी रणनीतियों को बदल रही हैं। लॉन्ग-टेनर बॉन्ड्स की ओर रुख करके राज्य अपने रीपेमेंट दायित्वों को भविष्य के लिए टाल रहे हैं। मार्च 2025 के अंत तक, स्टेट गवर्नमेंट सिक्योरिटीज की वेटेड एवरेज मैच्योरिटी बढ़कर 8.85 साल हो गई है, जो पिछले फाइनेंशियल साइकिल में 8.50 साल थी।
बढ़ता कर्ज और लिक्विडिटी का गणित
यह बदलाव कुल बाजार उधारी में 14% की बढ़ोतरी के बीच आया है, जो अब ₹62.97 लाख करोड़ के स्तर पर है। राज्यों के लिए यह लिक्विडिटी मैनेजमेंट का एक तरीका है। 20 से 30 साल तक की लंबी अवधि में लोन फैलाकर राज्य अपनी कैश फ्लो जरूरतों को मैनेज कर रहे हैं, हालांकि इसके लिए उन्हें उधारी लागत पर थोड़ा प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है। केंद्र सरकार ने भी 5 नवंबर, 2026 को ₹1.09 लाख करोड़ की एडवांस टैक्स डिवोल्यूशन किस्त जारी की है, ताकि राज्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को फंड कर सकें।
राज्यों की अलग-अलग रणनीति
देश भर में कर्ज प्रबंधन के तरीके अलग-अलग हैं। तेलंगाना ने 14.33 साल की मैच्योरिटी प्रोफाइल के साथ एक रूढ़िवादी रुख अपनाया है, जबकि गुजरात का प्रोफाइल 4.50 साल पर है। यह अंतर दिखाता है कि हर राज्य अपनी राजस्व जरूरतों को अलग तरह से संतुलित कर रहा है।
क्या हैं खतरे?
यह रणनीति शॉर्ट-टर्म कैश फ्लो में तो मदद करती है, लेकिन वास्तविक कर्ज का बोझ कम नहीं करती। राज्यों का डेट-टू-जीडीपी रेशियो बढ़कर 29.5% हो गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस मिली हुई 'फिस्कल स्पेस' का उपयोग उत्पादक परिसंपत्तियों (productive assets) के निर्माण में होगा, या यह केवल वेतन और सब्सिडी जैसे खर्चों में खत्म हो जाएगा?
आगे की राह
सिक्सटींथ फाइनेंस कमीशन ने 3% फिस्कल डेफिसिट का लक्ष्य रखा है। पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे अधिक कर्ज वाले राज्यों पर अब कड़ी नजर रहेगी। भविष्य में यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य लंबी अवधि की उधारी के साथ फिस्कल डिसिप्लिन को कैसे बनाए रखते हैं।
