रूस के Vankorneft प्रोजेक्ट में ONGC Videsh की **49.9%** हिस्सेदारी है, लेकिन यह निवेश US के कड़े प्रतिबंधों से कोई सुरक्षा नहीं देता। भारतीय रिफाइनरियों के लिए Compliance का बोझ बढ़ गया है और भविष्य में नए टैरिफ का खतरा मंडरा रहा है।
भारत की सरकारी एनर्जी कंपनियां रूस के Vostok Oil डेवलपमेंट के तहत आने वाले Vankorneft प्रोजेक्ट में 49.9% हिस्सेदारी रखती हैं। बाजार में यह गलतफहमी है कि विदेश में मालिकाना हक होने से वहां से आने वाला कच्चा तेल भारतीय मूल का माना जाएगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत यह रूसी कच्चा तेल ही है।
US प्रतिबंधों का असर
'Lindsey O Graham Sanctioning and Iran Act of 2026' के आने के बाद रेगुलेटरी माहौल काफी सख्त हो गया है। US के Office of Foreign Assets Control (OFAC) ने अक्टूबर 2025 में ही Vankorneft को प्रतिबंधों की सूची में डाल दिया था। इसका सीधा मतलब यह है कि चाहे कंपनियां तेल की हिस्सेदार हों, लेकिन इसकी ढुलाई, इंश्योरेंस और इम्पोर्ट के लिए उन्हें उन्हीं कानूनी बाधाओं का सामना करना पड़ेगा जो किसी भी रूसी तेल की खरीद पर लागू होती हैं।
भारतीय रिफाइनरियों के लिए रिस्क
रूस से कच्चा तेल मंगाने वाली भारतीय रिफाइनरियों पर अब भारी Compliance का बोझ है। शिपिंग लाइन्स, इंश्योरेंस प्रोवाइडर्स और बिचौलियों पर वेस्टर्न रेगुलेटर्स की कड़ी नजर है। Taimyr Peninsula से आने वाले हर शिपमेंट की कानूनी जांच अनिवार्य है। यदि इन प्रतिबंधों के कारण अतिरिक्त टैरिफ लगाए जाते हैं, तो रिफाइनरियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर दबाव बढ़ना तय है।
निवेशकों की नजर क्यों है?
निवेशकों के लिए मुख्य चिंता यह है कि क्या ये कंपनियां बिना किसी जुर्माने या अतिरिक्त खर्च के इन एसेट्स को मैनेज कर पाएंगी। ONGC और इसकी विदेशी शाखा ONGC Videsh के लिए अब फोकस इस पर है कि जियोपॉलिटिकल तनाव उनकी लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल हेल्थ को कैसे प्रभावित करता है। बाजार अब इस पर नजर रखेगा कि मैनेजमेंट अपनी इंपोर्ट स्ट्रैटेजी को इन नियमों के अनुरूप कैसे बदलता है।
