सरकार की नई मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम को लेकर भारतीय स्मार्टफोन मेकर्स ने चिंता जताई है। बाजार में **20%** की गिरावट और **₹1,000 करोड़** का टर्नओवर टारगेट पूरा करना कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
सरकार की नई मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर प्रोडक्शन को बढ़ावा देना है। इसके तहत भारतीय ब्रांड्स को 5% का इंसेंटिव और रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर अतिरिक्त लाभ दिया जा रहा है। लेकिन, समस्या यह है कि 2025-26 फाइनेंशियल ईयर के लिए ₹1,000 करोड़ का अनिवार्य टर्नओवर थ्रेसहोल्ड कंपनियों की कमर तोड़ रहा है।
बाजार की सुस्ती बनी बाधा
स्मार्टफोन बाजार में सालाना 20% की गिरावट आई है, जिससे सेल्स टारगेट पूरा करना नामुमकिन जैसा लग रहा है। घरेलू ब्रांड्स मुख्य रूप से बजट सेगमेंट में काम करते हैं, जहां मार्जिन पहले से ही बेहद कम है। यदि कंपनियां जबरन प्रोडक्शन बढ़ाती हैं, तो इन्वेंट्री बढ़ने और वर्किंग कैपिटल पर भारी दबाव आने का खतरा है।
कांट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स बनाम घरेलू ब्रांड
बड़ी कांट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां अपने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर के चलते ऐसे टारगेट आसानी से पूरा कर लेती हैं, जबकि छोटे भारतीय ब्रांड्स को कंपोनेंट की कीमतों में उतार-चढ़ाव और स्केल बढ़ाने में संघर्ष करना पड़ता है। बिना पॉलिसी में बदलाव के, इस स्कीम का फायदा घरेलू कंपनियों के बजाय बड़ी असेंबलिंग यूनिट्स को मिलने की संभावना है।
क्या बदलाव हो सकता है?
स्कीम में लोकल कंपोनेंट्स के लिए 1.5% का इंसेंटिव भी है, लेकिन मौजूदा डिमांड को देखते हुए मैन्युफैक्चरर्स अभी कोई भी जोखिम लेने से बच रहे हैं। इंडस्ट्री के जानकारों के मुताबिक, कंपनियां दिसंबर अंत तक सरकार से इन नियमों में ढील देने की मांग कर सकती हैं, ताकि मौजूदा बाजार स्थितियों के हिसाब से इसे एडजस्ट किया जा सके।
