आज भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर खुला है। सोमवार को रुपया **8 पैसे** गिरकर **95.25** पर खुला, जिसकी मुख्य वजह डॉलर का मजबूत होना और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की बढ़ती कीमतें हैं। हालांकि, रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार और विदेशी निवेश से कुछ सहारा मिला है, लेकिन मध्य-पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव के चलते बाजार सतर्क है।
तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक तनाव का असर
रुपये पर दबाव की एक बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में हालिया उछाल है। भारत कच्चे तेल का एक बड़ा आयातक है, इसलिए ऊंची कीमतें का मतलब है कि देश को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अधिक डॉलर की आवश्यकता होगी, जिससे घरेलू मुद्रा पर दबाव पड़ता है।
यह स्थिति स्ट्रेिट ऑफ होर्मुज के आसपास भू-राजनीतिक अनिश्चितता से और जटिल हो गई है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह के तनाव से तेल बाजारों में बड़ी उथल-पुथल हो सकती है, जिसका सीधा असर रुपये पर पड़ेगा और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महंगाई बढ़ सकती है।
भंडार से मिली स्थिरता
इन चुनौतियों के बावजूद, देश के मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार की बदौलत रुपये में भारी गिरावट नहीं आई है। 31 जुलाई को समाप्त सप्ताह के लिए भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड USD 692.866 बिलियन तक पहुंच गया। यह भंडार एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) जरूरत पड़ने पर अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित कर सकता है।
इसके अलावा, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) से लगातार हो रहे निवेश ने भी घरेलू बाजार को सहारा दिया है, जिससे मुद्रा के मूल्य में बड़ी गिरावट को रोका जा सका है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए
निवेशक अब वैश्विक संकेतों पर कड़ी नजर रख रहे हैं जो मुद्रा की दिशा तय करेंगे। इनमें कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता, अमेरिकी डॉलर इंडेक्स की मजबूती और भारतीय इक्विटी में विदेशी पूंजी के प्रवाह की आवृत्ति शामिल है।
हालांकि मौजूदा विदेशी मुद्रा भंडार कुछ राहत दे रहा है, लेकिन मध्य-पूर्व में तनाव का अचानक बढ़ना या अमेरिकी ब्याज दरों की उम्मीदों में कोई बड़ा बदलाव और दबाव पैदा कर सकता है। बाजार सतर्क बना हुआ है, जैसा कि शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स और निफ्टी जैसे प्रमुख सूचकांकों के सपाट से नकारात्मक प्रदर्शन से जाहिर है।
