अगले कुछ महीनों में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले एक सीमित दायरे में ही ट्रेड करता नजर आएगा। एक्सपर्ट्स का मानना है कि फॉरेन इनफ्लो (Foreign Inflow) के बावजूद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) को बढ़ाने और डॉलर देनदारियों को पूरा करने पर ज्यादा ध्यान दे रहा है, जिससे रुपये को मजबूत होने का मौका कम मिलेगा।
रुपये की चाल क्यों रहेगी सीमित?
विदेशी निवेशक भले ही भारतीय इक्विटी मार्केट (Equity Market) में जुलाई में वापसी कर चुके हैं और 5 महीने की बिकवाली का सिलसिला टूटा है, लेकिन इनफ्लो (Inflow) के बावजूद रुपये में बड़ी मजबूती की उम्मीद नहीं है। फॉरेक्स (Forex) जानकारों का कहना है कि इसके पीछे RBI की मौजूदा पॉलिसी है। RBI इन फॉरेन इनफ्लो का इस्तेमाल रुपये को मजबूत करने के बजाय अपने फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व (Foreign Exchange Reserves) को बढ़ाने में कर रहा है।
RBI का रिजर्व बढ़ाने पर फोकस
यह रणनीति RBI को पुराने मार्केट इंटरवेंशन (Market Intervention) से पैदा हुई डॉलर देनदारियों को पूरा करने में मदद करती है। अनुमान है कि RBI की फॉरवर्ड डॉलर प्रतिबद्धताएं (Forward Dollar Commitments) $100 अरब से अधिक हैं, जो कि रुपये को ज्यादा मजबूत होने से रोकने के लिए काफी है।
आगे क्या हैं अनुमान?
एनालिस्ट्स (Analysts) के मुताबिक, रुपया फिलहाल अपने मौजूदा स्तर के आसपास ही बना रहेगा। अनुमान है कि अगले 3 महीनों में यह 95.25 प्रति डॉलर और एक साल में 95.95 के स्तर पर पहुंच सकता है। इस साल अब तक रुपया 6% कमजोर हो चुका है, जो ग्लोबल इकोनॉमिक (Economic) बदलावों के बीच दबाव को दिखाता है।
आयात-भारी उद्योगों पर असर
रुपये की यह साइडवेज (Sideways) चाल निवेशकों और बिजनेसेज के लिए अहम है। मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing), ऑटोमोबाइल (Automobile) और एविएशन (Aviation) जैसे सेक्टर्स, जो ज्यादा इंपोर्ट (Import) पर निर्भर हैं, उन्हें रुपये के कमजोर रहने पर अपने प्रॉफिट मार्जिन (Profit Margin) पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है। ये सेक्टर रॉ मैटेरियल (Raw Material) और फ्यूल (Fuel) के लिए डॉलर में भुगतान करते हैं।
अन्य जोखिम
इसके अलावा, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions) कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ला सकते हैं, जिसका सीधा असर भारत के ट्रेड बैलेंस (Trade Balance) और करेंसी (Currency) पर पड़ेगा। साथ ही, ऑफशोर नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड्स (NDFs) और ऑनशोर मार्केट (Onshore Market) के बीच आर्बिट्रेज (Arbitrage) एक्टिविटी भी डॉलर की मांग बढ़ा रही है, जिससे रुपये पर दबाव बना हुआ है। ऐसे में निवेशकों को RBI की मॉनेटरी पॉलिसी (Monetary Policy) और ग्लोबल क्रूड ऑयल (Crude Oil) की कीमतों पर नजर रखनी होगी।
