4 सितंबर, 2026 को Indian Rupee की शुरुआत डॉलर के मुकाबले **94.55-94.60** के दायरे में हुई है। पिछले सत्र में रुपया **94.48** पर बंद हुआ था। क्रूड ऑयल की ऊंची कीमतों से करेंसी पर दबाव है, हालांकि RBI का दखल और विदेशी फंड्स का आना इसे सहारा दे रहा है।
एनर्जी कॉस्ट का असर
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें घरेलू करेंसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिससे ग्लोबल मार्केट में तेल के दाम बढ़ते ही डॉलर की डिमांड बढ़ जाती है। यह स्ट्रक्चरल दबाव रुपये को डॉलर के मुकाबले मजबूत होने से रोक रहा है, क्योंकि इंपोर्ट बिल का बोझ बढ़ता जा रहा है।
RBI का दखल और विदेशी निवेश
बाजार में अस्थिरता को थामने के लिए Reserve Bank of India सक्रिय भूमिका निभा रहा है। केंद्रीय बैंक का लक्ष्य किसी भी प्रकार की बड़ी गिरावट या अफरा-तफरी को रोकना है। राहत की बात यह है कि विदेशी मुद्रा मोबिलाइजेशन स्कीम के जरिए अब तक $136 बिलियन से अधिक का फंड आया है, जो इंपोर्ट के बढ़ते खर्चों के बीच एक मजबूत बफर का काम कर रहा है।
ग्लोबल मार्केट की चाल
निवेशकों की नजरें अब अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों (Interest Rates) की नीतियों पर टिकी हैं। फेड की नीतियों में किसी भी बदलाव का सीधा असर अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड पर पड़ेगा, जिससे इमर्जिंग मार्केट्स में कैपिटल फ्लो बदल सकता है। इसके अलावा, मिडिल ईस्ट में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव भी वैश्विक निवेशकों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। आने वाले समय में रुपये की स्थिरता ग्लोबल रिस्क और RBI के मैनेजमेंट के बीच बने संतुलन पर निर्भर करेगी।
