UBS Investment Bank के मुताबिक, भारतीय रुपया अगले 18 महीनों में डॉलर के मुकाबले **100** के मनोवैज्ञानिक स्तर तक गिर सकता है। स्ट्रक्चरल ट्रेड चुनौतियां और ग्लोबल मैक्रो प्रेशर इसके मुख्य कारण बताए जा रहे हैं।
भारतीय रुपया फिलहाल डॉलर के मुकाबले 95.70 से 95.96 के दायरे में ट्रेड कर रहा है। UBS Investment Bank के चीफ स्ट्रैटेजिस्ट भानु बवेजा का कहना है कि अगले 18 महीने में रुपये में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है। यह चेतावनी किसी अचानक आए संकट का संकेत नहीं है, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद बुनियादी चुनौतियों को दर्शाती है।
क्यों दबाव में है रुपया?
सबसे बड़ी समस्या ग्लोबल लेवल पर भारत के एक्सपोर्ट (Exports) को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने की है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि मॉनेटरी पॉलिसी से स्ट्रक्चरल समस्याओं को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता। कमजोर रुपया आयात को महंगा बना देता है, जिससे देश के भीतर महंगाई बढ़ सकती है।
इसके अलावा, US बॉन्ड यील्ड का बढ़ना भी बड़ी वजह है। जब US बॉन्ड आकर्षक हो जाते हैं, तो ग्लोबल निवेशक अपना पैसा इमर्जिंग मार्केट्स (जैसे भारत) से निकालकर US की तरफ ले जाते हैं। आजकल निवेशक AI सेक्टर में तेजी देख रहे हैं, जिसके कारण भारत के बजाय US, कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों को प्राथमिकता दी जा रही है।
क्रूड ऑयल का असर
कच्चा तेल (Crude Oil) भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी है। अगर ग्लोबल मार्केट में तेल की कीमतें $130 से $140 प्रति बैरल तक पहुंचती हैं, तो भारत पर दोहरा बोझ पड़ेगा। इससे आयात बिल बढ़ेगा और रुपये पर और दबाव आएगा। हालांकि, RBI का लक्ष्य किसी एक फिक्स्ड रेट को बचाने के बजाय रुपये की गिरावट को नियंत्रित और सुचारू रखना है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
आगे चलकर बाजार की नजर ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) और फॉरेन इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टमेंट (FII) के डेटा पर होगी। क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल रुपये की चाल तय करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
