भारतीय रुपया आज डॉलर के मुकाबले **95.60** के स्तर पर कारोबार कर रहा है। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बाजार के सेंटीमेंट को कमजोर कर रही हैं। हालांकि रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार एक ढाल के रूप में काम कर रहा है, लेकिन वेस्ट एशिया में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव के कारण ट्रेडर सतर्क बने हुए हैं।
बुधवार के कारोबारी सत्र की शुरुआत में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 95.60-95.65 के दायरे में रहा। करेंसी पर फिलहाल दो तरफा दबाव है; एक तरफ ग्लोबल ऑयल की अस्थिरता है और दूसरी तरफ विदेशी निवेशकों का लगातार पैसा निकालना।
कच्चे तेल की चिंताएं
ग्लोबल एनर्जी कॉस्ट अभी भी रुपये के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। ब्रेंट क्रूड $99.22 प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रहा है, जिससे भारत का एनर्जी इंपोर्ट बिल लगातार बढ़ रहा है। वेस्ट एशिया में चल रहे विवाद की वजह से सप्लाई चेन बाधित होने का डर है, जो कीमतों को और ऊपर ले जा सकता है।
विदेशी निवेशकों की निकासी
फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (FIIs) लगातार भारतीय बाजारों में बिकवाली कर रहे हैं। डेटा के मुताबिक, सितंबर महीने में अब तक $1.81 बिलियन की निकासी हो चुकी है, जिससे इस साल का कुल आउटफ्लो $25.87 बिलियन पर पहुंच गया है। ग्लोबल कैपिटल अब AI सेक्टर से जुड़ी कंपनियों की तरफ रुख कर रही है, जिससे भारतीय इक्विटी पर असर पड़ा है।
RBI का रुख
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया इस वोलेटिलिटी को नियंत्रित करने के लिए एक्टिव है। रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार ने मार्केट को एक मजबूती प्रदान की है। हालांकि, RBI का फोकस रुपये के लिए कोई निश्चित 'फ्लोर' तय करने के बजाय अत्यधिक उतार-चढ़ाव को कम करने पर है।
निवेशकों के लिए असर
रुपये में गिरावट का सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ रहा है जो कच्चे माल और एनर्जी का इंपोर्ट करती हैं। ऑयल मार्केटिंग, केमिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टरों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। आने वाले दिनों में ऑयल प्राइस ट्रेंड्स और वेस्ट एशिया की स्थिति तय करेगी कि रुपया किस दिशा में जाएगा।
