गुरुवार को इंडियन रुपया डॉलर के मुकाबले **26 पैसे** टूटकर **95.99** पर बंद हुआ। ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल के दाम बढ़ने से डॉलर की मांग बढ़ गई है, जिसका सीधा असर भारतीय करेंसी पर दिख रहा है।
क्रूड ऑयल का खेल और रुपये की कमजोरी
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ती हैं, तेल कंपनियों को भुगतान के लिए ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ती है। बाजार में डॉलर की इसी बढ़ती डिमांड और सप्लाई के असंतुलन के कारण रुपये की वैल्यू पर दबाव बनता है, जो सीधे तौर पर देश के ट्रेड बैलेंस को प्रभावित करता है।
अलग-अलग सेक्टर पर असर
रुपये के गिरने से हर सेक्टर पर अलग तरह का प्रभाव पड़ता है। Indian Oil Corp (IOCL), Bharat Petroleum (BPCL), और Hindustan Petroleum (HPCL) जैसी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा, पेंट, लुब्रिकेंट्स और केमिकल बनाने वाली कंपनियां, जो कच्चे तेल के डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल करती हैं, उनकी लागत में भी इजाफा हो सकता है।
हालांकि, आईटी (IT) और फार्मा जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर को थोड़ा फायदा मिल सकता है, क्योंकि वे अपनी कमाई डॉलर में करते हैं। लेकिन यह फायदा वैश्विक मांग और अन्य मार्केट कंडीशन्स पर भी निर्भर करता है।
RBI की भूमिका और निवेशकों के लिए संकेत
रुपये में गिरावट के चलते विदेशी निवेशकों (FIIs) का सेंटिमेंट बिगड़ सकता है, जिससे बाजार में बिकवाली का दबाव बन सकता है। Reserve Bank of India (RBI) फिलहाल स्थिति पर नजर बनाए हुए है। अगर उतार-चढ़ाव ज्यादा बढ़ता है, तो रिजर्व बैंक फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में दखल दे सकता है। फिलहाल निवेशकों को क्रूड ऑयल की कीमतों, महंगाई के आंकड़ों और आरबीआई की कमेंट्री पर कड़ी नजर रखनी चाहिए।
