क्रूड ऑयल की कीमतों में **$100** प्रति बैरल के पार जाने से भारतीय रुपया बुरी तरह लड़खड़ा गया है। इस हफ्ते रुपया **95.55** के निचले स्तर पर बंद हुआ है, जो मई के बाद की सबसे बड़ी गिरावट है।
बाजार की हलचल
शुक्रवार को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 95.55 पर बंद हुआ। हफ्ते भर के दौरान इसमें 1.1% की गिरावट दर्ज की गई है, जो मई के बाद का सबसे खराब प्रदर्शन है। इस गिरावट के पीछे की बड़ी वजह वेस्ट एशिया में चल रहे जियोपॉलिटिकल टेंशन और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में आपूर्ति में बाधा है, जिसके चलते क्रूड ऑयल की कीमतें $100 के पार निकल गई हैं।
अर्थव्यवस्था पर दबाव
भारत अपनी जरूरत का 88% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि क्रूड में हर $10 की बढ़ोतरी से भारत की जीडीपी ग्रोथ पर 20 से 30 बेसिस पॉइंट्स का बुरा असर पड़ सकता है। इससे आयात बिल बढ़ेगा और चालू खाता (Current Account) पर दबाव और ज्यादा बढ़ जाएगा।
निवेशकों के लिए जोखिम
इस करेंसी डेप्रिसिएशन और महंगी एनर्जी का सीधा असर कॉर्पोरेट अर्निंग्स पर पड़ेगा। मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और केमिकल सेक्टर की कंपनियां तेल आधारित कच्चे माल पर निर्भर हैं। अगर ये कंपनियां अपनी बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर नहीं डाल पाईं, तो उनके मार्जिन पर काफी दबाव दिखेगा। साथ ही, अगर महंगाई दर ज्यादा बनी रही, तो Reserve Bank of India (RBI) के लिए ब्याज दरों में कटौती करना मुश्किल हो जाएगा।
RBI की भूमिका
हालांकि बाजार में अस्थिरता है, लेकिन देश का फॉरेक्स रिजर्व $740.8 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संकेत दिया है कि केंद्रीय बैंक स्थिति पर नजर बनाए हुए है और वित्तीय स्थिरता के लिए लिक्विडिटी मैनेज करने के सभी उपाय करने को तैयार है।
निवेशकों को अब आने वाले दिनों में घरेलू महंगाई के आंकड़ों और ग्लोबल एनर्जी ट्रेंड्स पर नजर रखनी चाहिए।
