10 सितंबर को भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर **95.25** के स्तर पर पहुंच गया है। इसकी मुख्य वजह ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों का **$101** प्रति बैरल के करीब पहुंचना है।
भारतीय रुपया आज सुबह के कारोबार में 95.25 के स्तर पर ट्रेड कर रहा है, जो पिछले सत्र के 95.10 के क्लोजिंग प्राइस से काफी नीचे है। डॉलर इंडेक्स में मजबूती और इसका 98.81 के स्तर पर पहुंचना अन्य इमर्जिंग मार्केट्स की करेंसी के लिए भी सिरदर्द बना हुआ है।
तेल की कीमतों का सीधा असर
भारत अपनी जरूरत का 88% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। जब ब्रेंट क्रूड $101 प्रति बैरल के करीब पहुंचता है, तो आयात का बिल भारी हो जाता है। तेल कंपनियों को भुगतान के लिए डॉलर की जरूरत होती है, जिससे बाजार में डॉलर की डिमांड बढ़ जाती है और रुपये पर दबाव साफ दिखता है।
सरकारी कंपनियों के लिए चुनौती
सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के लिए स्थिति और भी कठिन है क्योंकि भारत में फ्यूल के दाम फिलहाल स्थिर बने हुए हैं। लागत बढ़ने और बिक्री मूल्य स्थिर रहने के बीच कंपनियों के मार्जिन पर भारी दबाव है। निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि कैसे ये कंपनियां बढ़ते अंतर्राष्ट्रीय दबाव को मैनेज करती हैं।
RBI की भूमिका
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) करेंसी मार्केट में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए निगरानी कर रहा है। हालांकि RBI डॉलर बेचकर रुपये को सपोर्ट कर सकता है, लेकिन वह किसी एक स्तर पर फिक्सिंग करने के बजाय केवल गिरावट की रफ्तार को काबू में रखने पर फोकस करता है। अब निवेशकों की नजरें क्रूड के भाव और विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) के फ्लो पर टिकी हैं, क्योंकि आगे चलकर यही चीजें महंगाई और इंटरेस्ट रेट्स पर असर डालेंगी।
