भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले **94.48** के स्तर पर पहुंच गया है, जो पिछले **10** हफ्तों का उच्चतम स्तर है। RBI की स्पेशल करेंसी स्कीमों के जरिए आए **$136 बिलियन** के भारी विदेशी निवेश ने मार्केट में लिक्विडिटी बढ़ा दी है, जिससे बैंकिंग शेयरों में रौनक लौटी है।
बाजार में लिक्विडिटी और बैंकिंग शेयरों की दौड़
विदेशी मुद्रा के भारी प्रवाह (Inflow) ने घरेलू बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी का स्तर काफी बढ़ा दिया है। निवेशकों को उम्मीद है कि इस लिक्विडिटी से बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) और लेंडिंग ऑपरेशंस को मजबूती मिलेगी। इस खबर के बाद State Bank of India (SBI), HDFC Bank और ICICI Bank जैसे दिग्गज बैंकिंग शेयरों में तेजी दर्ज की गई है। RBI ने 31 अगस्त 2026 तक अपनी स्पेशल स्वैप विंडो को बंद कर दिया है, जिससे साफ है कि केंद्रीय बैंक जमा हुई राशि से संतुष्ट है। कुल जुटाए गए $136.377 बिलियन में से FCNR(B) डिपॉजिट का बड़ा हिस्सा $127.23 बिलियन रहा है।
ग्लोबल रिस्क और आगे की चुनौतियां
रुपये की मजबूती के बावजूद, तेल आयातक कंपनियों की ओर से डॉलर की मांग बनी हुई है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें अस्थिर हैं, जो भारत के इंपोर्ट बिल पर दबाव डाल सकती हैं। इसके अलावा, ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में बढ़त चिंता का विषय है। 10-year U.S. Treasury yields फिलहाल 4.78% के करीब हैं। मार्केट में इस बात की 63% से 67% संभावना जताई जा रही है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व इस महीने 25 बेसिस पॉइंट की ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। अगर फेड की तरफ से सख्ती बरती जाती है, तो डॉलर ग्लोबल लेवल पर मजबूत हो सकता है, जो रुपये की हालिया बढ़त के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
