17 अगस्त 2026 को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले **95.48** के स्तर पर खुला। यह गिरावट रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा FCNR(B) डिपॉजिट स्वैप की समय सीमा को **31 अगस्त 2026** तक बढ़ाने के फैसले के बाद आई है। RBI के इस कदम से डॉलर की सप्लाई में कमी की उम्मीद है, जिससे रुपये पर तत्काल दबाव बढ़ रहा है।
RBI के फैसले से रुपये पर दबाव
17 अगस्त 2026 को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.48 के स्तर पर खुला, जो कि पिछले कुछ समय से चल रहे रुझानों के विपरीत है। यह गिरावट रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) द्वारा अचानक विदेशी मुद्रा नीति में किए गए बदलाव के बाद देखी गई है। केंद्रीय बैंक ने नॉन-रेजिडेंट इंडियन (NRI) डिपॉजिट्स के लिए फॉरेन करेंसी स्वैप फैसिलिटी की समय सीमा को 30 सितंबर 2026 से घटाकर 31 अगस्त 2026 कर दिया है।
डॉलर की सप्लाई पर असर
इस स्वैप फैसिलिटी का मुख्य उद्देश्य बैंकों को विदेशी मुद्रा जुटाने में मदद करना था, खासकर फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (FCNR(B)) डिपॉजिट्स के जरिए। बैंकों को इन डॉलर्स को एक अनुकूल एक्सचेंज रेट पर रुपए में बदलने की सुविधा दी जा रही थी। इस योजना को जबरदस्त सफलता मिली और इसने $52.3 बिलियन का इनफ्लो आकर्षित किया। मजबूत प्रतिक्रिया को देखते हुए, RBI ने इस विंडो को जल्दी बंद करने का फैसला किया है। इसका सीधा मतलब यह है कि घरेलू बाजार में डॉलर की सप्लाई में कमी आ सकती है। जैसे-जैसे यह फैसिलिटी बंद होगी, बाजार इस उम्मीद के साथ एडजस्ट करेगा कि इस खास चैनल से कम डॉलर सिस्टम में आएंगे, जिससे अल्पावधि में रुपये पर दबाव बढ़ेगा।
एशियाई मुद्राओं में मिला-जुला प्रदर्शन
जहां रुपया दबाव में था, वहीं अन्य एशियाई मुद्राओं ने डॉलर के मुकाबले मिश्रित, लेकिन अक्सर मजबूत, प्रदर्शन दिखाया। इंडोनेशियाई रुपिया, ताइवान डॉलर और दक्षिण कोरियाई वोन जैसी मुद्राओं में मजबूती देखी गई। इससे यह संकेत मिलता है कि रुपये की गिरावट का संबंध किसी व्यापक क्षेत्रीय रुझान के बजाय घरेलू नियामक बदलावों से अधिक है। डॉलर इंडेक्स, जो डॉलर को अन्य प्रमुख मुद्राओं की एक बास्केट के मुकाबले मापता है, एक महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है, जिस पर बाजार की नजर रहती है। डॉलर की कमजोरी कभी-कभी उभरते बाजारों की मुद्राओं को सहारा दे सकती है।
निवेशकों के लिए अहम जानकारी
यह समझना महत्वपूर्ण है कि RBI का यह फैसला केवल FCNR(B) स्वैप विंडो पर लागू होता है। RBI ने स्पष्ट किया है कि इन डिपॉजिट्स के लिए स्वैप ट्रांजैक्शन 11 सितंबर 2026 तक RBI के साथ किए जा सकते हैं। इसके अलावा, एक्सटर्नल कमर्शियल बोरिंग्स (ECBs) और ओवरसीज फॉरेन करेंसी बोरिंग्स (OFCBs) जैसी अन्य स्वैप विंडो अप्रभावित हैं और 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहेंगी। यह अंतर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि RBI केवल डिपॉजिट-आधारित योजनाओं से आ रहे लिक्विडिटी इनफ्लो का प्रबंधन कर रहा है, न कि सभी विदेशी मुद्रा स्वैप चैनलों को टाइट कर रहा है।
आगे क्या देखना होगा?
भविष्य में, रुपये की चाल कुछ प्रमुख कारकों पर निर्भर करेगी। निवेशक कच्चे तेल की कीमतों पर बारीकी से नजर रख रहे हैं, ब्रेंट क्रूड लगभग $89 के स्तर पर है। तेल की ऊंची कीमतें भारतीय आयातकों के लिए डॉलर की मांग बढ़ाती हैं, जिससे रुपये पर और दबाव पड़ता है। इसके अतिरिक्त, ट्रेडर्स यह देखेंगे कि क्या RBI ऑफ-शोर नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDF) या ओवर-द-काउंटर (OTC) बाजारों में हस्तक्षेप करता है या नहीं। आने वाले हफ्तों में निर्यातकों की हेजिंग रणनीतियों को प्रबंधित करने की क्षमता भी फोकस का एक क्षेत्र होगी।
